Thursday, November 3, 2011

अज्ञेय की दो लघु कविताएं

स्वनामधन्य कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की बहुपठित दो लघु कविताएं प्रस्तुत हैं। इस कविता के लिखे जाने से अब तक गंगा-यमुना में कितना पानी बह चुका है, लेकिन इनके निहितार्थ अब तक नहीं बदले हैं। आप भी इनका आस्वादन करें...
सांप

तुम सभ्य तो हुए नहीं
नगर में बसना
भी तुम्हें नहीं आया।
एक बात पूछूं, उत्तर दोगे
तब कैसे सीखा डंसना
विष कहां से पाया?


पुल

जो पुल बनाएंगे
वे अनिवार्यत: पीछे रह जाएंगे
सेनाएं हो जाएंगी पार
मारे जाएंगे रावण
जयी होंगे राम
जो निर्माता रहे इतिहास में
बंदर कहलाएंगे

Monday, October 31, 2011

...बहक रहे हैं सभी कदम

गीतकार बनज कुमार बनज का यह मधुर गीत जयपुर से प्रकाशित हिंदी दैनिक समाचार पत्र डेली न्यू•ा के 30 अक्टूबर को प्रकाशित रविवारीय परिशिष्ट हमलोग में छपा है। आप भी यह गीत गुनगुनाइए....

...बहक रहे हैं सभी कदम

किसी के ज्यादा किसी के कम, बहक रहे हैं सभी कदम।
दीपक क्या जुगनू भी पाले सूरज होने का इक भ्रम।

उजियारा घबराता है, अंधियारा इतराता है।
चंदा क्या सूरज को भी, यहां ग्रहण लग जाता है।
तन की कविता सुगम हुई है, मन के गीत हुए दुर्गम।
किसी के ज्यादा किसी के कम, बहक रहे हैं सभी कदम।

माया नाच नचाती है शासन को धमकाती है।
धूप मिली हमको ऐसी शाम निगलती जाती है।
बाज़ारों तक जा पहुंचे है धीरे-धीरे सभी धरम।
किसी के ज्यादा किसी के कम,बहक रहे हैं सभी कदम।

मौसम हमको चकित करे और हवाएं भ्रमित करें
जन गण मन की खुद्दारी नित सत्ता को नमन करे।
कहां ढूंढने जाऊं अब में, कहां मिलेगी लाज शरम।
किसी के ज्यादा किसी के कम, बहक रहे हैं सभी कदम।

सुविधाओं के जंगल में खिले हुए चेहरे देखे।
मतलब की सुनने वाले हमने तो बहरे देखे।
किसके लिए चले थे यारो ,और कहां पर आये हम।
किसी के ज्यादा किसी के कम, बहक रहे हैं सभी कदम।

भागे भागे शहर मिले, और ठहरते गांव मिले।
जकड़े हुए स्वयं को ही, खुद के फेंके दांव मिले।
दीपक चाट रही कर्मों को, फिर भी कहते सफल जनम।
किसी के ज्यादा किसी के कम ,बहक रहे हैं सभी कदम।

Friday, October 28, 2011

क्या सचमुच आजाद हुए हम...

अभी-अभी हमने ज्योतिपर्व दीपावली मनाई। हजारों करोड़ रुपए मिठाइयों और आतिशबाजी पर खर्च कर दिए गए, लेकिन खुशी के इस माहौल में लाखों घर ऐसे भी रहे, जहां गरीबी-फाकाकशी का अंधेरा छाया रहा। ऐसे में कर्नल वी. पी. सिंह की यह कविता हृदय को बरबस ही कचोटती है। आप भी इस कविता का रसास्वादन कर महससूस करें कि देश की वास्तविक स्थिति क्या और कैसी है......

क्या सचमुच आजाद हुए हम...

जश्न कहीं हो किसी भवन में, डूबी जब बस्ती क्रंदन में
तब आंधी चलती चिंतन में और प्रश्न उठता है मन में
क्या सचमुच आजाद हुए हम...

पहले भी खुदगर्ज कई थे पर सब कुछ व्यापार नहीं था
संबंधों में अपनापन था रिश्तों का बाजार नहीं था
खुशबू बसती थी खेतों में, पड़ते थे सावन में झूले
अब कागज के फूल सजाकर उन मीठे गीतों को भूले
तुलसी की चौपाई जलती जब फिल्मी धुन के ईंधन में
तब आंधी चलती चिंतन में...

माना अनपढ़ थे बाबूजी, मां थी उपवासों की मारी
भाई की अपनी मजबूरी, भाभी की अपनी लाचारी
सज्जा के सामान नहीं थे, होड़ नहीं थी दिखलाने की
सब कुछ खोने में खुशियां थीं, चाह नहीं ज्यादा पाने की
तब टूटा घर, घर लगता था अब सूनापन है आंगन में
तब आंधी चलती चिंतन में...

पहले भी शासक होते थे, पर वे इतने क्रूर नहीं थे
ऊंचे महलों में रहकर भी वे जनता से दूर नहीं थे
न्याय उठाकर सर चलता था, तब गुंडों को छूट नहीं थी
भरे बीहड़ों में डाकू थे फिर भी इतनी लूट नहीं थी
आज दंड मिलता निर्बल को, अपराधी बैठे शासन में
तब आंधी चलती चिंतन में...

आज समय ऐसा आया है, अनुशासन का नाम नहीं है
जो रिश्वत से ना हो पाए ऐसा कोई काम नहीं है
झूठी कसमें हैं गीता पर शपथ खोखली राजघाट पर
गंगाजल तक बेच रहे हैं, चोर-उचक्के घाट-घाट पर
भक्त ठगे जाते मथुरा में, भक्तिन लुटती वृंदावन में
तब आंधी चलती चिंतन में...

कहीं महल में अट्टहास है कहीं झोपड़ी में मातम है
पेट जिसे भरने हो जितने वह पाता उतना ही कम है
कहीं लड़कपन बिना खिलौने, बिना स्नेह यौवन बढ़ता है
और कहीं कोई मस्ती में जीवन की सीढ़ी चढ़ता है
कहीं लाश सड़ती सड़कों पर और कहीं जलती चंदन में
तब आंधी चलती चिंतन में...

कोई सीमाओं पर आकर हमको आंख दिखा जाता है
हम हैं कौन कहां से आए कोई आकर बतलाता है
कोई कहता मान्य नहीं है शस्त्रों का भंडार तुम्हारा
कोई कहता हम जितना दें, उतना ही अधिकार तुम्हारा
भारत जब प्रतिबंधित होता वाशिंगटन, पेरिस, लंदन में
तब आंधी चलती चिंतन में...

आजादी का अर्थ नहीं है केवल सत्ता का परिवर्तन
आजादी का अर्थ नहीं है चंद चुने मोरों का नर्तन
आजादी का अर्थ नहीं है इक दिन झंडों का लहराना
आजादी का अर्थ नहीं है सबका उच्छृंखल हो जाना
कोई पगडंडी जब खोती संसद गृह के आकर्षण में
तब आंधी चलती चिंतन में...

आजादी है खुली हवा के झोंकों का सबको छू जाना
आजादी है ओस सरीखी नर्म पत्तियों पर चू जाना
आजादी है इंद्रधनुष के रंगों का मिल-जुलकर रहना
आजादी है निर्झरिणी सा सबके हित की खातिर बहना
आजादी जब परिभाषित हो बंधती सत्ता के बंधन में
तब आंधी चलती चिंतन में...
तब आंधी चलती चिंतन में और प्रश्न उठता है मन में
क्या सचमुच आजाद हुए हम...

Thursday, October 13, 2011

जब समंदर हो न पाई तो बहुत रोई नदी...

मानव मन की गति की थाह आज तक कोई नहीं पा सका है। कवियों ने मन की तुलना अपनी-अपनी कल्पना के आधार पर की है। सहारनपुर की वरिष्ठ कवयित्री इंदिरा गौड़ ने 8 अक्टूबर की रात धवल चांदनी के साये में आयोजित 'गीत चांदनीÓ में मन की तुलना नदी से करते हुए जब यह काव्य रचना सुनाई तो हर श्रोता इस काव्य रचना की भाव रूपी नदी में खुद को बहने से नहीं रोक पाया।
आप भी लीजिए इस मधुर रचना का आनंद....


बह रही मुझमें निरंतर सोच की कोई नदी,
घाट सोए, कूल सोए, पर नहीं सोई नदी।
बह रही मुझमें निरंतर...

एक तट है दूर कितना दूसरे तटबंध से,
साथ चलते हैं बंधे शायद किसी अनुबंध से,
क्या पता किसने तटों के बीच में बोई नदी।
बह रही मुझमें निरंतर...

आचमन जब-जब किया, कुछ रत्न आए हाथ में,
दे गई हर लहर मुझको गीत कुछ सौगात में,
जब कभी मैली हुई तो आंख ने धोई नदी।
बह रही मुझमें निरंतर...

अनवरत जल के परस से रेत हो जाती शिला,
साधना से टूट जाती दर्प की हर शृंखला,
जब समंदर हो न पाई तो बहुत रोई नदी।
बह रही मुझमें निरंतर....

Monday, October 10, 2011

चांदनी में नहाने के दिन आ गए...

अपने देश में सदियों से आश्विन पूर्णिमा शरद पूर्णिमा के रूप में मनाई जाती है। इस दिन मंदिरों में देव विग्रहों को धवल वस्त्र धारण कराए जाते हैं तथा श्वेत पुष्पों से शृंगार किया जाता है। अमृतमयी चंद्र-किरणों से अभिसिक्त खीर प्रसादस्वरूप वितरित की जाती है। तरुण समाज गुलाबी नगर में पिछले 40 वर्षों से शरद पूर्णिमा से ठीक पहले आने वाले शनिवार की रात गीतों के कार्यक्रम 'गीत चांदनीÓ का आयोजन कर रही है। इसी कड़ी में गत 8 अक्टूबर को जय क्लब लॉन में गीतों की महफिल सजाई गई। इसमें कवियों-कवयित्रियों ने एक से बढ़कर एक गीतों की प्रस्तुति दी। सहारनपुर से आईं वरिष्ठ कवयित्री इंदिरा गौड़ ने जब यह रचना सुनाई तो श्रोता जैसे मंत्रमुग्ध हो उठे। उनकी रचना की इस चांदनी में आप भी करें अवगाहन.....


चांदनी में नहाने के दिन आ गए...
कतरा कतरा झड़े चांद आकाश से,
है कठिन छूटना जादुई पाश से,
रात के मुसकुराने के दिन आ गए।
चांदनी में नहाने के ...
प्यार के साज पर नेह भीगी छुअन,
यामिनी भर झड़ी हारसिंगार बन,
डूबकर पार जाने के दिन आ गए।
चांदनी में नहाने के...
ओढ़कर ओढऩी चांद-तारों जड़ी,
खिलखिलाती निशा दे रही है तड़ी,
तम को ठेंगा दिखाने के दिन आ गए।
चांदनी में नहाने के...
तोड़कर तट बही रातभर कौमुदी,
पी गया सुबह दिनमान सारी नदी,
भोर तक गुनगुनाने के दिन आ गए।
चांदनी में नहाने के...

Friday, December 31, 2010

...तो हर बात सुनी जाती है


हां, तो सभी साहित्य प्रेमी मित्रों को नववर्ष की मंगलकामनाओं के साथ प्रस्तुत है जयपुर की संस्था रसकलश की ओर से 29 दिसंबर की शाम जवाहर कला केंद्र के रंगायन सभागार में संजोई गई 'रजनीगंधाÓ काव्य संध्या से प्रो. वसीम बरेलवी की रचनाओं का गुलदस्ता। यह जैसे-जैसे आपके सामने आएगा, जीवन के कई रंग आपके सामने आते जाएंगे। जीवन-दर्शन, खेल-राजनीति, संस्कार-संस्कृति से लेकर वर्तमान हालात और इसमें फंसे मनुपुत्रों की मजबूरियां.... सब कुछ उनकी रचनाओं के विषय हैं। सीधे-सपाट शब्दों में बड़ी से बड़ी बातें कहने का क्या हुनर पाया है वसीम साहब ने...... विशेष तो क्या कहूं आप स्वयं पढ़कर देख लें-

जमीं तो जैसी है वैसी ही रहती है लेकिन,
जमीन बांटने वाले बदलते रहते हैं।
पतंग जैसा ये उडऩा भी कोई उडऩा है,
कि उड़ रहे हैं मगर दूसरों के हाथ में।

इस जमाने का बड़ा कैसे बनूं मैं,
इतना छोटापन मेरे वश का नहीं।

आगे बढऩा है तो आवाजें सुनी जाती नहीं,
रास्ता देने का मतलब है कि खुद पीछे रहो।

कहां गईं मेरे चेहरे की झुर्रियां सारी,
ये नन्हें बच्चे के हाथों ने क्या कमाल किया।

रोशनी से हैं दामन बचाए,
कितने खुद्दार होते हैं साये।

पानी पे तैरती हुई ये लाश देखिए,
और सोचिए कि डूबना कितना मुहाल है।

गरीब लहरों पे पहरे बिठाए जाते हैं,
समंदरों की तलाशी कोई नहीं लेता


नहीं गोदें बदलना चाहता है, ये बच्चा पांव चलना चाहता है।
वो मेरे साथ चलना चाहता है, कि मुझको ही बदलना चाहता है।


तखातुब में जो मेरे नाम का एलान हो जाए,
तुम्हारा क्या बिगड़ता है मेरी पहचान हो जाए।
किसी से कोई भी उम्मीद रखना छोड़कर देखो,
तो ये रिश्ते निभाना किस कदर आसान हो जाए।

(तखातुब = संबोधन)
न पाने से किसी के है न कुछ खोने से मतलब है,
ये दुनिया है, इसे तो कुछ न कुछ होने से मतलब है।
घर पर एक शाम भी जीने का बहाना न मिले,
सीरियल खत्म न हो जाए तो खाना न मिले।
इन्हीं गलियों में सभी खो गए चलते-फिरते,
घर से निकलूं तो कोई यार पुराना न मिले।

घरों की तरबियत क्या आ गई टीवी के हाथों में,
कोई बच्चा अब अपने बाप के ऊपर नहीं जाता।
मोहब्बत के ये आंसूं हैं इन्हें आंखों में रहने दो,
शरीफों के घरों का मसला कभी बाहर नहीं जाता।


मैं उसके घर नहीं जाता वो मेरे घर नहीं आता,
मगर इन एहतियातों से ताल्लुक मर नहीं जाता।
बुरे-अच्छे हों जैसे भी हों सभी रिश्ते यहीं के हैं,
किसी को साथ दुनिया से लेकर कोई नहीं जाता।

मेरे अंदर जो सच्चाई बहुत है,
जला कुछ भी तो आंच आई बहुत है।
किसी मजलूम की आंखों से देखा,
तो ये दुनिया नजर आई बहुत है।
(मजलूम = प्रताडि़त)
तुझी को आंख भर कर देख पाऊं,
मुझे बस इतनी बीनाई बहुत है।
नहीं चलने लगी यूं मेरे पीछे,
ये दुनिया मैंने ठुकराई बहुत है।
(बीनाई = देखने की क्षमता)

रातभर शहर की दीवारों पर गिरती रही ओस,
और सूरज को समंदर से ही फुरसत नहीं मिली।

मुझे गम है तो बस इतना ही गम है,
तेरी दुनिया मेरी ख्वाबों से कम है।

तुम्हारा साथ भी छूटा तुम अजनबी भी हुए,
मगर जमाना तुम्हें अब भी मुझमें ढूंढता है।

ये सोचकर कोई अहदे वफा करो हमसे,
हम एक वादे पे उमरें गुजार देते हैं।

तुम्हारे बारे में कुछ सोचने का हक भी नहीं,
मगर तुम्हारे ही बारे में सोचता हूं मैं।
तुझे पाने की कोशिश में कुछ इतना खो चुका हूं मैं,
कि तुम अगर मिल भी जाओ तो अब मिलने का गम होगा।

मैं जिन दिनों तेरे बारे में सोचता हूं बहुत,
उन्हीं दिनों तो ये दुनिया समझ में आती है।

क्या अजब आरजू घर के बूढ़ों की है,
शाम हो तो कोई घर से बाहर न हो।


जिसको कमतर समझते रहे हो वसीम
मिलके देखो कहीं तुमसे बेहतर न हो।

तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते,
इसीलिए तो तुम्हें हम नजर नहीं आते।
मोहब्बतों के दिलों की यही खराबी है,
ये रूठ जाएं तो फिर लौटकर नहीं आते।
जिन्हें सलीका है तहजीबे गम समझने का,
उन्हीं के रोने में आंसू नजर नहीं आते।
खुशी की आंख में आंसू की भी जगह रखना,
बुरे जमाने कभी पूछकर नहीं आते।


आंखों-आंखों रहे और कोई घर न हो,
ख्वाब जैसा किसी का मुकद्दर न हो।



क्या बताऊं कैसा खुद को दर-बदर मैंने किया,
उम्रभर किस किसके हिस्से का सफर मैंने किया।
तू तो नफरत भी न कर पाएगा इस शिद्दत के साथ,
जिस बला का प्यार तुझसे बेखबर मैंने किया।

हमारा अज्मे सफर कब किधर का हो जाए,
ये वो नहीं जो किसी रहगुजर का हो जाए।
उसी को जीने का हक है जो इस जमाने में,
इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए।
(अज्म = इरादा)

सबने मिलाए हाथ यहां तीरगी के साथ,
कितना बड़ा मजाक हुआ रोशनी के साथ।
शर्तें लगाई जाती नहीं दोस्ती के साथ,
कीजिए मुझे कबूल मेरी हर कमी के साथ।
किस काम की रही ये दिखावे की जिंदगी,
वादे किए किसी से गुजारी किसी के साथ।
(तीरगी = अंधकार)

मोहब्बत में बुरी नीयत से कुछ सोचा नहीं जाता,
कहा जाता है उसको बेवफा समझा नहीं जाता।
झुकाता है ये सर जिसकी इबादत के लिए उस तक,
तेरा जज्बा तो जाता है तेरा सज्दा नहीं जाता।
दिल में मंदिर का सा माहौल बना देता है,
कोई एक शमां सी हर शाम जला देता है।
जिंदगी दी है तो ये शर्ते इबादत न लगा,
पेड़ का साया भला पेड़ को क्या देता है।

उसने क्या लाज रखी है मेरी गुमराही ही,
मैं भटकूं तो भटक कर भी उसी तक पहुंचूं।

कहां कतरे की गमख्वारी करे है,
समंदर है अदाकारी करे है।
कोई माने या न माने उसकी मर्जी,
मगर वो हुक्म तो जारी करे है।
नहीं लम्हा भी जिसकी दस्तरस में,
वही सदियों की तैयारी करे है।

बुलावा आएगा चल देंगे हम भी,
सफर की कौन तैयारी करे है।
(दस्तरस= वश में)

कौन सी बात कहां कैसे कही जाती है,
ये सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है।
एक बिगड़ी हुई औलाद भला क्या जाने,
कैसे मां-बाप के होठों से हंसी जाती है।

Thursday, December 30, 2010

रसकलश की रजनीगंधा में महकी गजलें

नववर्ष के स्वागत में 31 दिसंबर की मध्यरात्रि के बाद से आयोजनों का सिलसिला शुरू होगा जो कई दिनों तक चलेगा, लेकिन जयपुर की संस्था रसकलश ने जाते हुए वर्ष 2010 की विदाई में 29 दिसंबर की शाम जवाहर कला केंद्र के रंगायन सभागार में 'रजनीगंधाÓ काव्य संध्या सजाई। शाम जैसे-जैसे गहराती गई, शायरी भी विभिन्न रंगों को अपने दायरे में समेटती चली गई। इसमें बरेली से आए प्रो. वसीम बरेलवी और ग्वालियर के मदन मोहन दानिश ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को गदगद कर दिया। ये शायर किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं और इसमें पाठकों का समय न लेते हुए मैं सीधे आपको इनकी रचनाओं से ही रू-ब-रू कराता हूं। अगली कड़ी में प्रो. वसीम बरेलवी की रचनाओं से रू-ब-रू कराऊंगा, जिसमें जिंदगी के कई रंग देखने को मिलेंगे।

तो शुरू करते हैं मदन मोहन दानिश से :
अगर लब पर किसी के सिर्फ एक मुस्कान होती है,
तो फिर अनजान सूरत भी कहां अनजान होती है।

पत्थर पहले खुद को पत्थर करता है,
उसके बाद ही कुछ कारीगर करता है।
एक जरा सी किश्ती ने ललकारा है,
अब देखें क्या ढोंग समंदर करता है।

दर्द सीने में छिपाए रखा, हमने माहौल बनाए रखा।
मौत आई थी कई दिन पहले, उसको बातों में लगाए रखा।।

धीरे-धीरे ठहर-ठहरकर आता है,
कोई हुनर जीते जी मरकर आता है।
गैर जरूरी कम कर दो शृंगार अगर,
फिर देखो क्या रूप निखरकर आता है।

बस मुश्किल से बचकर निकलना आता है,
अब किसको माहौल बदलना आता है।
भेष बदलने में तुम माहिर हो बेशक,
उसको तो किरदार बदलना आता है।
आज उसी की दुनिया है दानिश साहब,
जिसको हर सांचे में ढलना आता है।

कमरे के जिस कोने में गुलदान रहा,
जाने क्यों बस वो कोना वीरान रहा।
बीच भंवर से किश्ती कैसे बच निकली,
बहुत दिनों तक दरिया भी हैरान रहा।

आंसू को मुस्कान बनाना आता है,
इस मोती का मोल बढ़ाना आता है।
रातों का कितना अहसान है मुफलिस पर,
ख्वाब में उसके रोज खजाना आता है।

मेरी हर गुफ्तगू जमीं से रही, यूं तो फुरसत में आसमान भी था।
जब नतीजा सुनाया लोगों ने, तब लगाया ये मेरा इम्तिहान भी था।
जब मेरे पांव से जमीन खिसकी, तब लगा सर पे आसमान भी था।

हो गए तुम फिर कहीं आबाद क्या
हिल गई तन्हाई की बुनियाद क्या
अच्छी रौनक है तुम्हारी बज्म में
आ गए सब शहर के बरबाद क्या।

ये माना इस तरफ रास्ता न जाए,
मगर फिर भी मुझे रोका न जाए।
उलझने के लिए सौ उलझनें हैं,
बस अपने आप से उलझा न जाए।
बदल सकती है रुख तस्वीर अपना,
कुछ इतने गौर से देखा न जाए।
बड़ी कीमत अदा करनी पड़ेगी,
किसी मासूम को परखा न जाए।
हमारी अर्ज बस इतनी है दानिश,
उदासी का सबब पूछा न जाए।


जब अपनी बेकली में बेखुदी से कुछ नहीं होता,
पुकारें क्यों किसी को हम, किसी से कुछ नहीं होता।
सफर हो रात का तो हौसला ही काम आता है,
अंधेरों में अकेली रोशनी से कुछ नहीं होता।
कोई जब शहर से जाए तो रौनक रूठ जाती है,
किसी की शहर में मौजूदगी से कुछ नहीं होता।
चमक यूं नहीं पैदा हुई है मेरी जां तुझमें,
न कहना फिर कभी तू बेरुखी से कुछ नहीं होता।
तुम्हें दुश्वार है हंसना है, मुझे दुश्वार रोना है,
यहीं लगता है दानिश आदमी से कुछ नहीं होता।


रंगे दुनिया कितना गहरा हो गया,
आदमी का रंग फीका हो गया।
डूबने की जिद पर किश्ती आ गई,
बस यहीं मजबूर दरिया हो गया।
रात क्या होती है हमसे पूछिए,
आप तो सोए सवेरा हो गया।
आज खुद को बेचने निकले थे हम,
आज ही बाजार मंदा हो गया।
गम अंधेरे का नहीं दानिश, मगर
वक्त से पहले अंधेरा हो गया।

मैं खुद से किस कदर घबरा रहा हूं,
तुम्हारा नाम लेता जा रहा हूं।
गुजरता ही नहीं वो एक लम्हा,
इधर मैं हूं कि बीता जा रहा हूं।
इसी दुनिया में जी लगता था मेरा,
इसी दुनिया से अब घबरा रहा हूं।
ये नादानी तो क्या है दानिश,
समझना था जिससे समझा रहा हूं।

अगर कुछ दांव पर रखें तो सफर आसान होगा क्या?
मगर जो दांव पर रखेंगे वो ईमान होगा क्या?
कमी कोई भी हो वो भी जिंदगी में रंग भरती है,
अगर सब कुछ मिल जाए तो फिर अरमान होगा क्या?
कहानी का अहम किरदार क्यों खामोश है दानिश,
कहानी का सफर आगे बहुत वीरान होगा क्या?

हम अपने दुख को गाने लग गए हैं,
मगर इसमें जमाने लग गए हैं।
किसी की तरबीयत का है करिश्मा,
ये आंसू मुस्कुराने लग गए हैं।
ये हासिल है मेरी खामोशियों का
कि पत्थर आजमाने लग गए हैं।
मेरा बचपन यहां तक आ गया है,
मेरे सानों से साने लग गए हैं।
जिन्हें हम मंजिलों तक लेकर आए,
वही रास्ता दिखाने लग गए हैं।
शराफत रंग दिखलाती है दानिश,
सभी दुश्मन ठिकाने लग गए हैं।

कभी मायूस मत होना किसी बीमार के आगे,
भला लाचार क्या होना किसी लाचार के आगे।
मोहब्बत करने वाले जाने क्या तरकीब करते हैं,
बगरना लोग तो बुझ जाते हैं इनकार के आगे।
बिकाऊ कर दिया दुनिया को जिसने होशियारी से,
बिछी जाती है ये दुनिया उसी बाजार के आगे।

डराता है किसी मंजिल पर आकर ये तजस्सुस भी,
न जाने कौन सा मंजर हो किस दीवार के आगे।
किसी ठहरे हुए लम्हे की कीमत वक्त से पूछो,
उसी से टूटकर लम्हा रहा रफ्तार के आगे।


मुझको हर शख्स भला लगता है,
बस यही सबको बुरा लगता है।
हर तरफ प्यार है इज्जत है यहां,
ये इलाका तो नया लगता है।
बात बनती अगर बनाने से,
हम भी होते कहीं ठिकाने से।
वो कहां दूर तक गये दानिश,
जो परिंदे उड़े उड़ाने से।


खुद से यूं नाराजगी अच्छी नहीं,
हर तरफ से वापसी अच्छी नहीं।
कुछ का कुछ दानिश नजर आने लगे,
इस कदर भी रोशनी अच्छी नहीं।

ये साहिल के तमाशाई हैं मंजर देखने वाले,
समंदर में तो उतरेंगे समंदर देखने वाले।
सितारे कुछ बताते हैं नतीजा कुछ निकलता है,
बड़ी हैरत में हैं मेरा मुकद्दर देखने वाले।
करीना देखने का देखिए बस इनको आता है,
बहुत कुछ देख लेते हैं ये छुपकर देखने वाले।

सफर का रुख बदलकर देखते हैं,
तुम्हारे साथ चलकर देखते हैं।
कोई दस्तक पे दस्तक दे रहा है,
उठो दानिश निकलकर देखते हैं।
इधर क्या-क्या अजूबे हो रहे हैं,
मरीजे दिल भी अच्छे हो रहे हैं।
मोहब्बत, रतजगे, आवारागर्दी
जरूरी काम सारे हो रहे हैं।
जरा सी जिंदगी है चार दिन की,
उसी में सब तमाशे हो रहे हैं।
कभी आंसू कभी मुस्कान दानिश,
मोहब्बत है, करिश्मे हो रहे हैं।