<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020</id><updated>2011-11-03T05:27:06.461-07:00</updated><category term='स्‍वागत'/><category term='स्मरण'/><category term='अपील'/><category term='बधाई हो बधाई'/><title type='text'>साहित्‍य - संस्‍कृति ईटीसी</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>28</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-5162737299077411707</id><published>2011-11-03T05:23:00.000-07:00</published><updated>2011-11-03T05:27:06.502-07:00</updated><title type='text'>अज्ञेय की दो लघु कविताएं</title><content type='html'>स्वनामधन्य कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की बहुपठित दो लघु कविताएं प्रस्तुत हैं। इस कविता के लिखे जाने से अब तक गंगा-यमुना में कितना पानी बह चुका है, लेकिन इनके निहितार्थ अब तक नहीं बदले हैं। आप भी इनका आस्वादन करें... &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सांप&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम सभ्य तो हुए नहीं&lt;br /&gt;नगर में बसना &lt;br /&gt;भी तुम्हें नहीं आया। &lt;br /&gt;एक बात पूछूं, उत्तर दोगे&lt;br /&gt;तब कैसे सीखा डंसना&lt;br /&gt;विष कहां से पाया? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पुल&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो पुल बनाएंगे&lt;br /&gt;वे अनिवार्यत: पीछे रह जाएंगे&lt;br /&gt;सेनाएं हो जाएंगी पार&lt;br /&gt;मारे जाएंगे रावण&lt;br /&gt;जयी होंगे राम&lt;br /&gt;जो  निर्माता रहे इतिहास में &lt;br /&gt;बंदर कहलाएंगे&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-5162737299077411707?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/5162737299077411707/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=5162737299077411707' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/5162737299077411707'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/5162737299077411707'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='अज्ञेय की दो लघु कविताएं'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-418260707382426257</id><published>2011-10-31T12:30:00.000-07:00</published><updated>2011-10-31T12:31:20.553-07:00</updated><title type='text'>...बहक रहे हैं सभी कदम</title><content type='html'>गीतकार बनज कुमार बनज का यह मधुर गीत जयपुर से प्रकाशित हिंदी दैनिक समाचार पत्र डेली न्यू•ा के 30 अक्टूबर को प्रकाशित रविवारीय परिशिष्ट हमलोग में छपा है। आप भी यह गीत गुनगुनाइए....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;...बहक रहे हैं सभी कदम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी के ज्यादा किसी के कम, बहक रहे हैं सभी कदम।&lt;br /&gt;दीपक क्या जुगनू भी पाले सूरज होने का इक भ्रम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उजियारा घबराता है, अंधियारा इतराता है।&lt;br /&gt;चंदा क्या सूरज को भी, यहां ग्रहण लग जाता है।&lt;br /&gt;तन की कविता सुगम हुई है, मन के गीत हुए दुर्गम।&lt;br /&gt;किसी के ज्यादा किसी के कम, बहक रहे हैं सभी कदम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माया नाच नचाती है शासन को धमकाती है।&lt;br /&gt;धूप मिली हमको ऐसी शाम निगलती जाती है।&lt;br /&gt;बाज़ारों तक जा पहुंचे है धीरे-धीरे सभी धरम।&lt;br /&gt;किसी के ज्यादा किसी के कम,बहक रहे हैं सभी कदम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौसम हमको चकित करे और हवाएं भ्रमित करें &lt;br /&gt;जन गण मन की खुद्दारी नित सत्ता को नमन करे।&lt;br /&gt;कहां ढूंढने जाऊं अब में, कहां मिलेगी लाज शरम।&lt;br /&gt;किसी के ज्यादा किसी के कम, बहक रहे हैं सभी कदम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुविधाओं के जंगल में खिले हुए चेहरे देखे। &lt;br /&gt;मतलब की सुनने वाले हमने तो बहरे देखे।&lt;br /&gt;किसके लिए चले थे यारो ,और कहां पर आये हम।&lt;br /&gt;किसी के ज्यादा किसी के कम, बहक रहे हैं सभी कदम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भागे भागे शहर मिले, और ठहरते गांव मिले।&lt;br /&gt;जकड़े हुए स्वयं को ही, खुद के फेंके दांव मिले।&lt;br /&gt;दीपक चाट रही कर्मों को, फिर भी कहते सफल जनम।&lt;br /&gt;किसी के ज्यादा किसी के कम ,बहक रहे हैं सभी कदम।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-418260707382426257?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/418260707382426257/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=418260707382426257' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/418260707382426257'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/418260707382426257'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2011/10/blog-post_31.html' title='...बहक रहे हैं सभी कदम'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-7080990536758486677</id><published>2011-10-28T12:30:00.000-07:00</published><updated>2011-10-28T12:32:25.771-07:00</updated><title type='text'>क्या सचमुच आजाद हुए हम...</title><content type='html'>अभी-अभी हमने ज्योतिपर्व दीपावली मनाई। हजारों करोड़ रुपए मिठाइयों और आतिशबाजी पर खर्च कर दिए गए, लेकिन खुशी के इस माहौल में लाखों घर ऐसे भी रहे, जहां गरीबी-फाकाकशी का अंधेरा छाया रहा। ऐसे में कर्नल वी. पी. सिंह की यह कविता हृदय को बरबस ही कचोटती है। आप भी इस कविता का रसास्वादन कर महससूस करें कि देश की वास्तविक स्थिति क्या और कैसी है......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;क्या सचमुच आजाद हुए हम...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जश्न कहीं हो किसी भवन में, डूबी जब बस्ती क्रंदन में&lt;br /&gt;तब आंधी चलती चिंतन में और प्रश्न उठता है मन में&lt;br /&gt;क्या सचमुच आजाद हुए हम...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले भी खुदगर्ज कई थे पर सब कुछ व्यापार नहीं था&lt;br /&gt;संबंधों में अपनापन था रिश्तों का बाजार नहीं था&lt;br /&gt;खुशबू बसती थी खेतों में, पड़ते थे सावन में झूले&lt;br /&gt;अब कागज के फूल सजाकर उन मीठे गीतों को भूले&lt;br /&gt;तुलसी की चौपाई जलती जब फिल्मी धुन के ईंधन में &lt;br /&gt;तब आंधी चलती चिंतन में...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माना अनपढ़ थे बाबूजी, मां थी उपवासों की मारी &lt;br /&gt;भाई की अपनी मजबूरी, भाभी की अपनी लाचारी&lt;br /&gt;सज्जा के सामान नहीं थे, होड़ नहीं थी दिखलाने की&lt;br /&gt;सब कुछ खोने में खुशियां थीं, चाह नहीं ज्यादा पाने की&lt;br /&gt;तब टूटा घर, घर लगता था अब सूनापन है आंगन में &lt;br /&gt;तब आंधी चलती चिंतन में...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले भी शासक होते थे, पर वे इतने क्रूर नहीं थे&lt;br /&gt;ऊंचे महलों में रहकर भी वे जनता से दूर नहीं थे &lt;br /&gt;न्याय उठाकर सर चलता था, तब गुंडों को छूट नहीं थी&lt;br /&gt;भरे बीहड़ों में डाकू थे फिर भी इतनी लूट नहीं थी&lt;br /&gt;आज दंड मिलता निर्बल को, अपराधी बैठे शासन में &lt;br /&gt;तब आंधी चलती चिंतन में...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज समय ऐसा आया है, अनुशासन का नाम नहीं है&lt;br /&gt;जो रिश्वत से ना हो पाए ऐसा कोई काम नहीं है&lt;br /&gt;झूठी कसमें हैं गीता पर शपथ खोखली राजघाट पर&lt;br /&gt;गंगाजल तक बेच रहे हैं, चोर-उचक्के घाट-घाट पर &lt;br /&gt;भक्त ठगे जाते मथुरा में, भक्तिन लुटती वृंदावन में&lt;br /&gt;तब आंधी चलती चिंतन में...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहीं महल में अट्टहास है कहीं झोपड़ी में मातम है&lt;br /&gt;पेट जिसे भरने हो जितने वह पाता उतना ही कम है&lt;br /&gt;कहीं लड़कपन बिना खिलौने, बिना स्नेह यौवन बढ़ता है&lt;br /&gt;और कहीं कोई मस्ती में जीवन की सीढ़ी चढ़ता है&lt;br /&gt;कहीं लाश सड़ती सड़कों पर और कहीं जलती चंदन में &lt;br /&gt;तब आंधी चलती चिंतन में...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई सीमाओं पर आकर हमको आंख दिखा जाता है&lt;br /&gt;हम हैं कौन कहां से आए कोई आकर बतलाता है&lt;br /&gt;कोई कहता मान्य नहीं है शस्त्रों का भंडार तुम्हारा&lt;br /&gt;कोई कहता हम जितना दें, उतना ही अधिकार तुम्हारा&lt;br /&gt;भारत जब प्रतिबंधित होता वाशिंगटन, पेरिस, लंदन में&lt;br /&gt;तब आंधी चलती चिंतन में...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजादी का अर्थ नहीं है केवल सत्ता का परिवर्तन&lt;br /&gt;आजादी का अर्थ नहीं है चंद चुने मोरों का नर्तन &lt;br /&gt;आजादी का अर्थ नहीं है इक दिन झंडों का लहराना&lt;br /&gt;आजादी का अर्थ नहीं है सबका उच्छृंखल हो जाना&lt;br /&gt;कोई पगडंडी जब खोती संसद गृह के आकर्षण में&lt;br /&gt;तब आंधी चलती चिंतन में...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजादी है खुली हवा के झोंकों का सबको छू जाना&lt;br /&gt;आजादी है ओस सरीखी नर्म पत्तियों पर चू जाना&lt;br /&gt;आजादी है इंद्रधनुष के रंगों का मिल-जुलकर रहना&lt;br /&gt;आजादी है निर्झरिणी सा सबके हित की खातिर बहना &lt;br /&gt;आजादी जब परिभाषित हो बंधती सत्ता के बंधन में &lt;br /&gt;तब आंधी चलती चिंतन में...&lt;br /&gt;तब आंधी चलती चिंतन में और प्रश्न उठता है मन में&lt;br /&gt;क्या सचमुच आजाद हुए हम...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-7080990536758486677?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/7080990536758486677/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=7080990536758486677' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/7080990536758486677'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/7080990536758486677'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2011/10/blog-post_28.html' title='क्या सचमुच आजाद हुए हम...'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-8052787114165091707</id><published>2011-10-13T12:14:00.000-07:00</published><updated>2011-10-13T12:15:32.460-07:00</updated><title type='text'>जब समंदर हो न पाई तो बहुत रोई नदी...</title><content type='html'>मानव मन की गति की थाह आज तक कोई नहीं पा सका है। कवियों ने मन की तुलना अपनी-अपनी कल्पना के आधार पर की है। सहारनपुर की वरिष्ठ कवयित्री इंदिरा गौड़ ने 8 अक्टूबर की रात धवल चांदनी के साये में आयोजित 'गीत चांदनीÓ में मन की तुलना नदी से करते हुए जब यह काव्य रचना सुनाई तो हर श्रोता इस काव्य रचना की भाव रूपी नदी में खुद को बहने से नहीं रोक पाया। &lt;br /&gt;आप भी लीजिए इस मधुर रचना का आनंद....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;बह रही मुझमें निरंतर सोच की कोई नदी, &lt;br /&gt;घाट सोए, कूल सोए, पर नहीं सोई नदी।&lt;br /&gt;बह रही मुझमें निरंतर...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक तट है दूर कितना दूसरे तटबंध से,&lt;br /&gt;साथ चलते हैं बंधे शायद किसी अनुबंध से,&lt;br /&gt;क्या पता किसने तटों के बीच में बोई नदी।&lt;br /&gt;बह रही मुझमें निरंतर...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आचमन जब-जब किया, कुछ रत्न आए हाथ में,&lt;br /&gt;दे गई हर लहर मुझको गीत कुछ सौगात में,&lt;br /&gt;जब कभी मैली हुई तो आंख ने धोई नदी।&lt;br /&gt;बह रही मुझमें निरंतर...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनवरत जल के परस से रेत हो जाती शिला,&lt;br /&gt;साधना से टूट जाती दर्प की हर शृंखला,&lt;br /&gt;जब समंदर हो न पाई तो बहुत रोई नदी।&lt;br /&gt;बह रही मुझमें निरंतर....&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-8052787114165091707?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/8052787114165091707/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=8052787114165091707' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/8052787114165091707'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/8052787114165091707'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2011/10/blog-post_13.html' title='जब समंदर हो न पाई तो बहुत रोई नदी...'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-5691165171553100129</id><published>2011-10-10T12:27:00.001-07:00</published><updated>2011-10-10T12:28:06.854-07:00</updated><title type='text'>चांदनी में नहाने के दिन आ गए...</title><content type='html'>अपने देश में सदियों से आश्विन पूर्णिमा शरद पूर्णिमा के रूप में मनाई जाती है। इस दिन मंदिरों में देव विग्रहों को धवल वस्त्र धारण कराए जाते हैं तथा श्वेत पुष्पों से शृंगार किया जाता है। अमृतमयी चंद्र-किरणों से अभिसिक्त खीर प्रसादस्वरूप वितरित की जाती है। तरुण समाज गुलाबी नगर में पिछले 40 वर्षों से शरद पूर्णिमा से ठीक पहले आने वाले शनिवार की रात गीतों के कार्यक्रम 'गीत चांदनीÓ का आयोजन कर रही है। इसी कड़ी में गत 8 अक्टूबर को जय क्लब लॉन में गीतों की महफिल सजाई गई। इसमें कवियों-कवयित्रियों ने एक से बढ़कर एक गीतों की प्रस्तुति दी। सहारनपुर से आईं वरिष्ठ कवयित्री इंदिरा गौड़ ने जब यह रचना सुनाई तो श्रोता जैसे मंत्रमुग्ध हो उठे। उनकी रचना की इस चांदनी में आप भी करें अवगाहन.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;चांदनी में नहाने के दिन आ गए...&lt;br /&gt;कतरा कतरा झड़े चांद आकाश से,&lt;br /&gt;है कठिन छूटना जादुई पाश से,&lt;br /&gt;रात के मुसकुराने के दिन आ गए।&lt;br /&gt;चांदनी में नहाने के ...&lt;br /&gt;प्यार के साज पर नेह भीगी छुअन,&lt;br /&gt;यामिनी भर झड़ी हारसिंगार बन,&lt;br /&gt;डूबकर पार जाने के दिन आ गए।&lt;br /&gt;चांदनी में नहाने के...&lt;br /&gt;ओढ़कर ओढऩी चांद-तारों जड़ी,&lt;br /&gt;खिलखिलाती निशा दे रही है तड़ी, &lt;br /&gt;तम को ठेंगा दिखाने के दिन आ गए।&lt;br /&gt;चांदनी में नहाने के...&lt;br /&gt;तोड़कर तट बही रातभर कौमुदी,&lt;br /&gt;पी गया सुबह दिनमान सारी नदी,&lt;br /&gt;भोर तक गुनगुनाने के दिन आ गए।&lt;br /&gt;चांदनी में नहाने के...&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-5691165171553100129?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/5691165171553100129/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=5691165171553100129' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/5691165171553100129'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/5691165171553100129'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='चांदनी में नहाने के दिन आ गए...'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-9126107851928174233</id><published>2010-12-31T12:14:00.000-08:00</published><updated>2010-12-31T12:51:44.613-08:00</updated><title type='text'>...तो हर बात सुनी जाती है</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/TR47aijYw4I/AAAAAAAAAQ4/X6gZf57bPSk/s1600/wasim.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 183px; height: 276px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/TR47aijYw4I/AAAAAAAAAQ4/X6gZf57bPSk/s400/wasim.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5556944317359637378" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हां, तो सभी साहित्य प्रेमी मित्रों को नववर्ष की मंगलकामनाओं के साथ प्रस्तुत है जयपुर की संस्था रसकलश की ओर से 29 दिसंबर की शाम जवाहर कला केंद्र के रंगायन सभागार में संजोई गई 'रजनीगंधाÓ काव्य संध्या से प्रो. वसीम बरेलवी की रचनाओं का गुलदस्ता। यह जैसे-जैसे आपके सामने आएगा, जीवन के कई रंग आपके सामने आते जाएंगे। जीवन-दर्शन, खेल-राजनीति, संस्कार-संस्कृति से लेकर वर्तमान हालात और इसमें फंसे मनुपुत्रों की मजबूरियां.... सब कुछ उनकी रचनाओं के विषय हैं। सीधे-सपाट शब्दों में बड़ी से बड़ी बातें कहने का क्या हुनर पाया है वसीम साहब ने...... विशेष तो क्या कहूं आप स्वयं पढ़कर देख लें- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जमीं तो जैसी है वैसी ही रहती है लेकिन,&lt;br /&gt;जमीन बांटने वाले बदलते रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;पतंग जैसा ये उडऩा भी कोई उडऩा है,&lt;br /&gt;कि उड़ रहे हैं मगर दूसरों के हाथ में।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इस जमाने का बड़ा कैसे बनूं मैं,&lt;br /&gt;इतना छोटापन मेरे वश का नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे बढऩा है तो आवाजें सुनी जाती नहीं,&lt;br /&gt;रास्ता देने का मतलब है कि खुद पीछे रहो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहां गईं मेरे चेहरे की झुर्रियां सारी,&lt;br /&gt;ये नन्हें बच्चे के हाथों ने क्या कमाल किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोशनी से हैं दामन बचाए, &lt;br /&gt;कितने खुद्दार होते हैं साये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पानी पे तैरती हुई ये लाश देखिए,&lt;br /&gt;और सोचिए कि डूबना कितना मुहाल है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;गरीब लहरों पे पहरे बिठाए जाते हैं,&lt;br /&gt;समंदरों की तलाशी कोई नहीं लेता&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;नहीं गोदें बदलना चाहता है, ये बच्चा पांव चलना चाहता है।&lt;br /&gt;वो मेरे साथ चलना चाहता है, कि मुझको ही बदलना चाहता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तखातुब में जो मेरे नाम का एलान हो जाए,&lt;br /&gt;तुम्हारा क्या बिगड़ता है मेरी पहचान हो जाए।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;किसी से कोई भी उम्मीद रखना छोड़कर देखो,&lt;br /&gt;तो ये रिश्ते निभाना किस कदर आसान हो जाए।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;(तखातुब = संबोधन)&lt;br /&gt;न पाने से किसी के है न कुछ खोने से मतलब है,&lt;br /&gt;ये दुनिया है, इसे तो कुछ न कुछ होने से मतलब है।&lt;br /&gt;घर पर एक शाम भी जीने का बहाना न मिले,&lt;br /&gt;सीरियल खत्म न हो जाए तो खाना न मिले।&lt;br /&gt;इन्हीं गलियों में सभी खो गए चलते-फिरते,&lt;br /&gt;घर से निकलूं तो कोई  यार पुराना न मिले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घरों की तरबियत क्या आ गई टीवी के हाथों में,&lt;br /&gt;कोई बच्चा अब अपने बाप के ऊपर नहीं जाता।&lt;br /&gt;मोहब्बत के ये आंसूं हैं इन्हें आंखों में रहने दो,&lt;br /&gt;शरीफों के घरों का मसला कभी बाहर नहीं जाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं उसके घर नहीं जाता वो मेरे घर नहीं आता,&lt;br /&gt;मगर इन एहतियातों से ताल्लुक मर नहीं जाता।&lt;br /&gt;बुरे-अच्छे हों जैसे भी हों सभी रिश्ते यहीं के हैं,&lt;br /&gt;किसी को साथ दुनिया से लेकर कोई नहीं जाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे अंदर जो सच्चाई बहुत है,&lt;br /&gt;जला कुछ भी तो आंच आई बहुत है।&lt;br /&gt;किसी मजलूम की आंखों से देखा,&lt;br /&gt;तो ये दुनिया नजर आई बहुत है।&lt;br /&gt;(मजलूम = प्रताडि़त)&lt;br /&gt;तुझी को आंख भर कर देख पाऊं,&lt;br /&gt;मुझे बस इतनी बीनाई बहुत है।&lt;br /&gt;नहीं चलने लगी यूं मेरे पीछे,&lt;br /&gt;ये दुनिया मैंने ठुकराई बहुत है।&lt;br /&gt;(बीनाई = देखने की क्षमता)&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;रातभर शहर की दीवारों पर गिरती रही ओस,&lt;br /&gt;और सूरज को समंदर से ही फुरसत नहीं मिली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे गम है तो बस इतना ही गम है,&lt;br /&gt;तेरी दुनिया मेरी ख्वाबों से कम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारा साथ भी छूटा तुम अजनबी भी हुए,&lt;br /&gt;मगर जमाना तुम्हें अब भी मुझमें ढूंढता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सोचकर कोई अहदे वफा करो हमसे,&lt;br /&gt;हम एक वादे पे उमरें गुजार देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारे बारे में कुछ सोचने का हक भी नहीं,&lt;br /&gt;मगर तुम्हारे ही बारे में सोचता हूं मैं।&lt;br /&gt;तुझे पाने की कोशिश में कुछ इतना खो चुका हूं मैं,&lt;br /&gt;कि तुम अगर मिल भी जाओ तो अब मिलने का गम होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं जिन दिनों तेरे बारे में सोचता हूं बहुत,&lt;br /&gt;उन्हीं दिनों तो ये दुनिया समझ में आती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;क्या अजब आरजू घर के बूढ़ों की है,&lt;br /&gt;शाम हो तो कोई घर से बाहर न हो।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;जिसको कमतर समझते रहे हो वसीम&lt;br /&gt;मिलके देखो कहीं तुमसे बेहतर न हो।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते,&lt;br /&gt;इसीलिए तो तुम्हें हम नजर नहीं आते।&lt;br /&gt;मोहब्बतों के दिलों की यही खराबी है,&lt;br /&gt;ये रूठ जाएं तो फिर लौटकर नहीं आते।&lt;br /&gt;जिन्हें सलीका है तहजीबे गम समझने का,&lt;br /&gt;उन्हीं के रोने में आंसू नजर नहीं आते।&lt;br /&gt;खुशी की आंख में आंसू की भी जगह रखना,&lt;br /&gt;बुरे जमाने कभी पूछकर नहीं आते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;आंखों-आंखों रहे और कोई घर न हो,&lt;br /&gt;ख्वाब जैसा किसी का मुकद्दर न हो।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या बताऊं कैसा खुद को दर-बदर मैंने किया,&lt;br /&gt;उम्रभर किस किसके हिस्से का सफर मैंने किया।&lt;br /&gt;तू तो नफरत भी न कर पाएगा इस शिद्दत के साथ,&lt;br /&gt;जिस बला का प्यार तुझसे बेखबर मैंने किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारा अज्मे सफर कब किधर का हो जाए,&lt;br /&gt;ये वो नहीं जो किसी रहगुजर का हो जाए।&lt;br /&gt;उसी को जीने का हक है जो इस जमाने में,&lt;br /&gt;इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए।&lt;br /&gt;(अज्म = इरादा)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबने मिलाए हाथ यहां तीरगी के साथ,&lt;br /&gt;कितना बड़ा मजाक हुआ रोशनी के साथ।&lt;br /&gt;शर्तें लगाई जाती नहीं दोस्ती के साथ,&lt;br /&gt;कीजिए मुझे कबूल मेरी हर कमी के साथ।&lt;br /&gt;किस काम की रही ये दिखावे की जिंदगी,&lt;br /&gt;वादे किए किसी से गुजारी किसी के साथ।&lt;br /&gt;(तीरगी = अंधकार)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोहब्बत में बुरी नीयत से कुछ सोचा नहीं जाता,&lt;br /&gt;कहा जाता है उसको बेवफा समझा नहीं जाता।&lt;br /&gt;झुकाता है ये सर जिसकी इबादत के लिए उस तक,&lt;br /&gt;तेरा जज्बा तो जाता है तेरा सज्दा नहीं जाता।&lt;br /&gt;दिल में मंदिर का सा माहौल बना देता है,&lt;br /&gt;कोई एक शमां सी हर शाम जला देता है।&lt;br /&gt;जिंदगी दी है तो ये शर्ते इबादत न लगा,&lt;br /&gt;पेड़ का साया भला पेड़ को क्या देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने क्या लाज रखी है मेरी गुमराही ही,&lt;br /&gt;मैं भटकूं तो भटक कर भी उसी तक पहुंचूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहां कतरे की गमख्वारी करे है,&lt;br /&gt;समंदर है अदाकारी करे है।&lt;br /&gt;कोई माने या न माने उसकी मर्जी,&lt;br /&gt;मगर वो हुक्म तो जारी करे है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;नहीं लम्हा भी जिसकी दस्तरस में,&lt;br /&gt;वही सदियों की तैयारी करे है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;बुलावा आएगा चल देंगे हम भी,&lt;br /&gt;सफर की कौन तैयारी करे है।&lt;br /&gt;(दस्तरस= वश में)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;कौन सी बात कहां कैसे कही जाती है,&lt;br /&gt;ये सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है।&lt;br /&gt;एक बिगड़ी हुई औलाद भला क्या जाने,&lt;br /&gt;कैसे मां-बाप के होठों से हंसी जाती है।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-9126107851928174233?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/9126107851928174233/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=9126107851928174233' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/9126107851928174233'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/9126107851928174233'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2010/12/blog-post_31.html' title='...तो हर बात सुनी जाती है'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/TR47aijYw4I/AAAAAAAAAQ4/X6gZf57bPSk/s72-c/wasim.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-5574077347948240978</id><published>2010-12-30T11:02:00.000-08:00</published><updated>2010-12-30T11:55:31.652-08:00</updated><title type='text'>रसकलश की रजनीगंधा में महकी गजलें</title><content type='html'>नववर्ष के स्वागत में 31 दिसंबर की मध्यरात्रि के बाद से आयोजनों का सिलसिला शुरू होगा जो कई दिनों तक चलेगा, लेकिन जयपुर की संस्था रसकलश ने जाते हुए वर्ष 2010 की विदाई में 29 दिसंबर की शाम जवाहर कला केंद्र के रंगायन सभागार में 'रजनीगंधाÓ काव्य संध्या सजाई। शाम जैसे-जैसे गहराती गई, शायरी भी विभिन्न रंगों को अपने दायरे में समेटती चली गई।  इसमें बरेली से आए प्रो. वसीम बरेलवी और ग्वालियर के मदन मोहन दानिश ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को गदगद कर दिया। ये शायर किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं और इसमें पाठकों का समय न लेते हुए मैं सीधे आपको इनकी रचनाओं से ही रू-ब-रू कराता हूं। अगली कड़ी में प्रो. वसीम बरेलवी की रचनाओं से रू-ब-रू कराऊंगा, जिसमें जिंदगी के कई रंग देखने को मिलेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो शुरू करते हैं मदन मोहन दानिश से : &lt;br /&gt;अगर लब पर किसी के सिर्फ एक मुस्कान होती है,&lt;br /&gt;तो फिर अनजान सूरत भी कहां अनजान होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्थर पहले खुद को पत्थर करता है,&lt;br /&gt;उसके बाद ही कुछ कारीगर करता है। &lt;br /&gt;एक जरा सी किश्ती ने ललकारा है, &lt;br /&gt;अब देखें क्या ढोंग समंदर करता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दर्द सीने में छिपाए रखा, हमने माहौल बनाए रखा।&lt;br /&gt;मौत आई थी कई दिन पहले, उसको बातों में लगाए रखा।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरे-धीरे ठहर-ठहरकर आता है,&lt;br /&gt;कोई हुनर जीते जी मरकर आता है।&lt;br /&gt;गैर जरूरी कम कर दो शृंगार अगर,&lt;br /&gt;फिर देखो क्या रूप निखरकर आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस मुश्किल से बचकर निकलना आता है,&lt;br /&gt;अब किसको माहौल बदलना आता है।&lt;br /&gt;भेष बदलने में तुम माहिर हो बेशक,&lt;br /&gt;उसको तो किरदार बदलना आता है।&lt;br /&gt;आज उसी की दुनिया है दानिश साहब,&lt;br /&gt;जिसको हर सांचे में ढलना आता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कमरे के जिस कोने में गुलदान रहा,&lt;br /&gt;जाने क्यों बस वो कोना वीरान रहा।&lt;br /&gt;बीच भंवर से किश्ती कैसे बच निकली,&lt;br /&gt;बहुत दिनों तक दरिया भी हैरान रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आंसू को मुस्कान बनाना आता है,&lt;br /&gt;इस मोती का मोल बढ़ाना आता है।&lt;br /&gt;रातों का कितना अहसान है मुफलिस पर,&lt;br /&gt;ख्वाब में उसके रोज खजाना आता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी हर गुफ्तगू जमीं से रही, यूं तो फुरसत में आसमान भी था।&lt;br /&gt;जब नतीजा सुनाया लोगों ने, तब लगाया ये मेरा इम्तिहान भी था। &lt;br /&gt;जब मेरे पांव से जमीन खिसकी, तब लगा सर पे आसमान भी था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हो गए तुम फिर कहीं आबाद क्या&lt;br /&gt;हिल गई तन्हाई की बुनियाद क्या&lt;br /&gt;अच्छी रौनक है तुम्हारी बज्म में &lt;br /&gt;आ गए सब शहर के बरबाद क्या।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये माना इस तरफ रास्ता न जाए,&lt;br /&gt;मगर फिर भी मुझे रोका न जाए।&lt;br /&gt;उलझने के लिए सौ उलझनें हैं,&lt;br /&gt;बस अपने आप से उलझा न जाए।&lt;br /&gt;बदल सकती है रुख तस्वीर अपना,&lt;br /&gt;कुछ इतने गौर से देखा न जाए।&lt;br /&gt;बड़ी कीमत अदा करनी पड़ेगी,&lt;br /&gt;किसी मासूम को परखा न जाए।&lt;br /&gt;हमारी अर्ज बस इतनी है दानिश,&lt;br /&gt;उदासी का सबब पूछा न जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब अपनी बेकली में बेखुदी से कुछ नहीं होता,&lt;br /&gt;पुकारें क्यों किसी को हम, किसी से कुछ नहीं होता।&lt;br /&gt;सफर हो रात का तो हौसला ही काम आता है,&lt;br /&gt;अंधेरों में अकेली रोशनी से कुछ नहीं होता।&lt;br /&gt;कोई जब शहर से जाए तो रौनक रूठ जाती है,&lt;br /&gt;किसी की शहर में मौजूदगी से कुछ नहीं होता।&lt;br /&gt;चमक यूं नहीं पैदा हुई है मेरी जां तुझमें,&lt;br /&gt;न कहना फिर कभी तू बेरुखी से कुछ नहीं होता।&lt;br /&gt;तुम्हें दुश्वार है हंसना है, मुझे दुश्वार रोना है,&lt;br /&gt;यहीं लगता है दानिश आदमी से कुछ नहीं होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंगे दुनिया कितना गहरा हो गया,&lt;br /&gt;आदमी का रंग फीका हो गया।&lt;br /&gt;डूबने की जिद पर किश्ती आ गई, &lt;br /&gt;बस यहीं मजबूर दरिया हो गया।&lt;br /&gt;रात क्या होती है हमसे पूछिए,&lt;br /&gt;आप तो सोए सवेरा हो गया।&lt;br /&gt;आज खुद को बेचने निकले थे हम,&lt;br /&gt;आज ही बाजार मंदा हो गया।&lt;br /&gt;गम अंधेरे का नहीं दानिश, मगर&lt;br /&gt;वक्त से पहले अंधेरा हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं खुद से किस कदर घबरा रहा हूं,&lt;br /&gt;तुम्हारा नाम लेता जा रहा हूं। &lt;br /&gt;गुजरता ही नहीं वो एक लम्हा,&lt;br /&gt;इधर मैं हूं कि बीता जा रहा हूं।&lt;br /&gt;इसी दुनिया में जी लगता था मेरा,&lt;br /&gt;इसी दुनिया से अब घबरा रहा हूं।&lt;br /&gt;ये नादानी तो क्या है दानिश,&lt;br /&gt;समझना था जिससे समझा रहा हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर कुछ दांव पर रखें तो सफर आसान होगा क्या?&lt;br /&gt;मगर जो दांव पर रखेंगे वो ईमान होगा क्या? &lt;br /&gt;कमी कोई भी हो वो भी जिंदगी में रंग भरती है,&lt;br /&gt;अगर सब कुछ मिल जाए तो फिर अरमान होगा क्या?&lt;br /&gt;कहानी का अहम किरदार क्यों खामोश है दानिश,&lt;br /&gt;कहानी का सफर आगे बहुत वीरान होगा क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम अपने दुख को गाने लग गए हैं,&lt;br /&gt;मगर इसमें जमाने लग गए हैं।&lt;br /&gt;किसी की तरबीयत का है करिश्मा,&lt;br /&gt;ये आंसू मुस्कुराने लग गए हैं।&lt;br /&gt;ये हासिल है मेरी खामोशियों का&lt;br /&gt;कि पत्थर आजमाने लग गए हैं।&lt;br /&gt;मेरा बचपन यहां तक आ गया है,&lt;br /&gt;मेरे सानों से साने लग गए हैं।&lt;br /&gt;जिन्हें हम मंजिलों तक लेकर आए,&lt;br /&gt;वही रास्ता दिखाने लग गए हैं।&lt;br /&gt;शराफत रंग दिखलाती है दानिश,&lt;br /&gt;सभी दुश्मन ठिकाने लग गए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी मायूस मत होना किसी बीमार के आगे,&lt;br /&gt;भला लाचार क्या होना किसी लाचार के आगे।&lt;br /&gt;मोहब्बत करने वाले जाने क्या तरकीब करते हैं,&lt;br /&gt;बगरना लोग तो बुझ जाते हैं इनकार के आगे।&lt;br /&gt;बिकाऊ कर दिया दुनिया को जिसने होशियारी से,&lt;br /&gt;बिछी जाती है ये दुनिया उसी बाजार के आगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डराता है किसी मंजिल पर आकर ये तजस्सुस भी,&lt;br /&gt;न जाने कौन सा मंजर हो किस दीवार के आगे।&lt;br /&gt;किसी ठहरे हुए लम्हे की कीमत वक्त से पूछो,&lt;br /&gt;उसी से टूटकर लम्हा रहा रफ्तार के आगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;मुझको हर शख्स भला लगता है,&lt;br /&gt;बस यही सबको बुरा लगता है।&lt;br /&gt;हर तरफ प्यार है इज्जत है यहां,&lt;br /&gt;ये इलाका तो नया लगता है।&lt;br /&gt;बात बनती अगर बनाने से,&lt;br /&gt;हम भी होते कहीं ठिकाने से।&lt;br /&gt;वो कहां दूर तक गये दानिश,&lt;br /&gt;जो परिंदे उड़े उड़ाने से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुद से यूं नाराजगी अच्छी नहीं,&lt;br /&gt;हर तरफ से वापसी अच्छी नहीं।&lt;br /&gt;कुछ का कुछ दानिश नजर आने लगे,&lt;br /&gt;इस कदर भी रोशनी अच्छी नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये साहिल के तमाशाई हैं मंजर देखने वाले,&lt;br /&gt;समंदर में तो उतरेंगे समंदर देखने वाले।&lt;br /&gt;सितारे कुछ बताते हैं नतीजा कुछ निकलता है,&lt;br /&gt;बड़ी हैरत में हैं मेरा मुकद्दर देखने वाले।&lt;br /&gt;करीना देखने का देखिए बस इनको आता है,&lt;br /&gt;बहुत कुछ देख लेते हैं ये छुपकर देखने वाले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सफर का रुख बदलकर देखते हैं,&lt;br /&gt;तुम्हारे साथ चलकर देखते हैं।&lt;br /&gt;कोई दस्तक पे दस्तक दे रहा है,&lt;br /&gt;उठो दानिश निकलकर देखते हैं।&lt;br /&gt;इधर क्या-क्या अजूबे हो रहे हैं,&lt;br /&gt;मरीजे दिल भी अच्छे हो रहे हैं।&lt;br /&gt;मोहब्बत,  रतजगे,  आवारागर्दी&lt;br /&gt;जरूरी काम सारे हो रहे हैं। &lt;br /&gt;जरा सी जिंदगी है चार दिन की, &lt;br /&gt;उसी में सब तमाशे हो रहे हैं।&lt;br /&gt;कभी आंसू कभी मुस्कान दानिश,&lt;br /&gt;मोहब्बत है, करिश्मे हो रहे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-5574077347948240978?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/5574077347948240978/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=5574077347948240978' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/5574077347948240978'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/5574077347948240978'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='रसकलश की रजनीगंधा में महकी गजलें'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-7258700917373711233</id><published>2010-03-19T12:57:00.000-07:00</published><updated>2010-03-19T12:58:57.607-07:00</updated><title type='text'>अब कहां आएगा वो....</title><content type='html'>दिल्ली से प्रकाशित एक प्रमुख हिंदी दैनिक के नियमित स्तंभ---रंग ए जिंदगानी---में गुरुवार को प्रकाशित वजीर आगा की यह रचना मुझे अच्छी लगी, शायद आपको भी भाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धूप के साथ गया, साथ निभाने वाला&lt;br /&gt;अब कहां आएगा वो, लौट के आने वाला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रेत पर छोड़ गया, नक्श हजारों अपने&lt;br /&gt;किसी पागल की तरह, नक्श मिटाने वाला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब्ज शाखें कभी ऐसे नहीं चीखती हैं,&lt;br /&gt;कौन आया है, परिंदों को डराने वाला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शबनमी घास, घने फूल, लरजती किरणें&lt;br /&gt;कौन आया है, खजानों को लुटाने वाला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो आराम करें, सोचती आंखें मेरी&lt;br /&gt;रात का आखिरी तारा भी है जाने वाला।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-7258700917373711233?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/7258700917373711233/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=7258700917373711233' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/7258700917373711233'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/7258700917373711233'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2010/03/blog-post_19.html' title='अब कहां आएगा वो....'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-8583918337776787811</id><published>2010-03-05T12:31:00.000-08:00</published><updated>2010-03-05T12:35:24.787-08:00</updated><title type='text'>ख्वाब खुशबू के घर में रहते हैं</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S5Fq6_-V_QI/AAAAAAAAAPs/9b-ZptWJAQA/s1600-h/sheen.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S5Fq6_-V_QI/AAAAAAAAAPs/9b-ZptWJAQA/s400/sheen.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5445250986305518850" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली से प्रकाशित हिंदी दैनिक के गुरुवार के अंक में ---रंग-ए-जिंदगानी---कॉलम के तहत प्रसिद्ध शायर शीन काफ निजाम साहब की कुछ पंक्तियां प्रकाशित की गई हैं। आशा है आपको भी भाएंगी। लीजिए....गौर फरमाइए-----&lt;br /&gt;वो कहां चश्मे-तर में रहते हैं,&lt;br /&gt;ख्वाब खुशबू के घर में रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शहर का हाल जा के उनसे पूछ,&lt;br /&gt;हम तो अक्सर सफर में रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौसमों के मकान सूने हैं,&lt;br /&gt;लोग दीवारो-दर में रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्स हैं उनके आसमानों पर,&lt;br /&gt;चांद तारे तो घर में रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने देखा है दोस्तों को निजाम&lt;br /&gt;दुश्मनों के असर में रहते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-8583918337776787811?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/8583918337776787811/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=8583918337776787811' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/8583918337776787811'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/8583918337776787811'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='ख्वाब खुशबू के घर में रहते हैं'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/S5Fq6_-V_QI/AAAAAAAAAPs/9b-ZptWJAQA/s72-c/sheen.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-6104908508188983823</id><published>2010-02-20T12:34:00.000-08:00</published><updated>2010-02-20T12:35:25.241-08:00</updated><title type='text'>एक तिनका है बहुत तेरे लिए</title><content type='html'>दिल्ली से प्रकाशित हिंदी दैनिक हिंदुस्तान के सेंट्रल पेज पर प्रतिदिन किसी खास कवि की किसी अथॅपूणॅ रचना से कुछ पंक्तियां छपती हैं। अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध ने इन पंक्तियों में बहुत ही साधारण लहजे में काफी महत्वपूणॅ बातें कह दी हैं। आप भी आनंद लीजिए - &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ,&lt;br /&gt;एक दिन जब था मुंडेरे पर खड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आ अचानक दूर से उड़ता हुआ, &lt;br /&gt;एक तिनका आंख में मेरी पड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं झिझक उठा हुआ बेचैन सा, &lt;br /&gt;लाल होकर आंख भी दुखने लगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मूंठ देने लोग कपड़े की लगे,&lt;br /&gt;ऐंठ बेचारी दबे पांव भागने लगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब किसी ढब से निकल तिनका गया,&lt;br /&gt;तब समझ ने यों मुझे ताने दिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐंठता तू किसलिए इतना रहा,&lt;br /&gt;एक तिनका है बहुत तेरे लिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-6104908508188983823?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/6104908508188983823/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=6104908508188983823' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/6104908508188983823'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/6104908508188983823'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='एक तिनका है बहुत तेरे लिए'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-3250952746163252507</id><published>2009-12-18T05:18:00.000-08:00</published><updated>2009-12-18T05:22:32.008-08:00</updated><title type='text'>सियासत नफरतों का जख्म भरने ही नहीं देती</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SyuB-SIKMyI/AAAAAAAAAO8/1w0k4tGDyPc/s1600-h/munawwar.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 120px; height: 90px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SyuB-SIKMyI/AAAAAAAAAO8/1w0k4tGDyPc/s400/munawwar.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5416565883861087010" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;मशहूर शायर मुनव्वर राना ने अपनी रचनाओं में बहुत ही सरल शब्दों में जीवन के सत्य को उद्घाटित करने का स्तुत्य प्रयास किया है। दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय हिंदी दैनिक में बुधवार १६ दिसंबर को प्रकाशित उनकी इस रचना का आनंद लीजिए - &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है,&lt;br /&gt;न रोया कर बहुत रोने से छाती बैठ जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही मौसम था जब नंगे बदन छत पर टहलते थे,&lt;br /&gt;यही मौसम है अब सरदी सीने में बैठ जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलो माना कि शहनाई मसर्रत की निशानी है,&lt;br /&gt;मगर वह शख्स जिसकी आके बेटी बैठ जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े-बूढ़े कुएं में नेकियां क्यों फेंक आते हैं,&lt;br /&gt;कुएं में छुप कर क्यों ये नेकी बैठ जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सियासत नफरतों का जख्म भरने ही नहीं देती, &lt;br /&gt;जहां भरने पे आता है तो मक्खी बैठ जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो दुश्मन ही सही आवाज दे उसको मुहब्बत से,&lt;br /&gt;सलीके से बिठाकर देख हड्डी बैठ जाती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-3250952746163252507?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/3250952746163252507/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=3250952746163252507' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/3250952746163252507'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/3250952746163252507'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2009/12/blog-post_18.html' title='सियासत नफरतों का जख्म भरने ही नहीं देती'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SyuB-SIKMyI/AAAAAAAAAO8/1w0k4tGDyPc/s72-c/munawwar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-8471136581406472629</id><published>2009-12-09T11:50:00.000-08:00</published><updated>2009-12-09T11:58:27.253-08:00</updated><title type='text'>...इक तेरे कहने से क्या मैं बेवफा हो जाऊंगा</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SyABPC8eiYI/AAAAAAAAAOw/-YcYUhMXR3w/s1600-h/Waseem+Barelvi.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 299px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SyABPC8eiYI/AAAAAAAAAOw/-YcYUhMXR3w/s400/Waseem+Barelvi.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5413328110099532162" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मशहूर शायर वसीम बरेलवी को कई कवि सम्मेलनों और मुशायरों में सुनने का सुअवसर मिला है। तरन्नुम में उन्हें सुनना दिलो-दिमाग में ताजगी भर देता है। दिल्ली से प्रकाशित एक हिंदी दैनिक के स्थायी स्तंभ -रंग ए जिंदगानी- में मंगलवार को प्रकाशित उनकी ये पंक्तियां गौर फरमाइए...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने हर लफ्ज का खुद आईना हो जाऊंगा,&lt;br /&gt;उसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम गिराने में लगे थे तुमने सोचा भी नहीं,&lt;br /&gt;मैं गिरा तो मसअला बनकर खड़ा हो जाऊंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझको चलने दो अकेला है अभी मेरा सफर,&lt;br /&gt;रास्ता रोका गया तो काफिला हो जाऊंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सारी दुनिया की नजर में है मेरी अहद-ए-वफा,&lt;br /&gt;इक तेरे कहने से क्या मैं बेवफा हो जाऊंगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-8471136581406472629?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/8471136581406472629/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=8471136581406472629' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/8471136581406472629'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/8471136581406472629'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2009/12/blog-post_09.html' title='...इक तेरे कहने से क्या मैं बेवफा हो जाऊंगा'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SyABPC8eiYI/AAAAAAAAAOw/-YcYUhMXR3w/s72-c/Waseem+Barelvi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-5710925042530871040</id><published>2009-12-04T06:09:00.000-08:00</published><updated>2009-12-04T06:11:29.971-08:00</updated><title type='text'>...कोई आएगा दिल को आस रहे</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SxkYg1AhkeI/AAAAAAAAAOo/SkXKAuOjllE/s1600-h/bashir+badra.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 147px; height: 160px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SxkYg1AhkeI/AAAAAAAAAOo/SkXKAuOjllE/s400/bashir+badra.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5411383379526521314" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मशहूर शायर बशीर बद्र ने अपनी गजलों में जिंदगी के अनेक रंग दिखाए हैं। दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय स्तर के हिंदी दैनिक के कॉलम -रंग ए जिंदगानी- में गुरुवार को प्रकाशित यह गजल पेश  है। आप भी इसका लुत्फ उठाइए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुश रहे या बहुत उदास रहे, &lt;br /&gt;जिंदगी तेरे आसपास रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चांद इन बदलियों से निकलेगा,&lt;br /&gt;कोई आएगा दिल को आस रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम मुहब्बत के फूल हैं शायद,&lt;br /&gt;कोई कांटा भी आसपास रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे सीने में इस तरह बस जा, &lt;br /&gt;मेरी सांसों में तेरी बास रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज हम सब एक साथ खूब हंसे,&lt;br /&gt;और फिर देर तक उदास रहे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-5710925042530871040?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/5710925042530871040/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=5710925042530871040' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/5710925042530871040'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/5710925042530871040'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2009/12/blog-post_04.html' title='...कोई आएगा दिल को आस रहे'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SxkYg1AhkeI/AAAAAAAAAOo/SkXKAuOjllE/s72-c/bashir+badra.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-1150558896920299583</id><published>2009-12-01T11:20:00.000-08:00</published><updated>2009-12-01T11:22:45.148-08:00</updated><title type='text'>...चांद ने कितनी देर लगा दी आने में</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SxVs9J7-BXI/AAAAAAAAAOg/LsSEwirAZFU/s1600/gulzar3.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 228px; height: 288px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SxVs9J7-BXI/AAAAAAAAAOg/LsSEwirAZFU/s400/gulzar3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5410350325250786674" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;प्रख्यात गीतकार गुलजार ने हिंदी फिल्मी दुनिया के साथ साहित्य जगत को भी गुलजार किया है। नई दिल्ली से प्रकाशित एक प्रमुख हिंदी दैनिक के स्तंभ-रंग-ए-जिंदगानी- में सोमवार को प्रकाशित गुलजार की रचना का आप भी लुत्फ उठाएं.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुशबू जैसे लोग मिले अफसाने में,&lt;br /&gt;एक पुराना खत मिला अनजाने में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाना किसका जिक्र है इस अफसाने में,&lt;br /&gt;ददü मजे लेता है जो दुहराने में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम के साये बालिस्तों से नापे हैं,&lt;br /&gt;चांद ने कितनी देर लगा दी आने में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात गुजरते शायद थोड़ा वक्त लगे, &lt;br /&gt;जरा सी धूप दे उन्हें मेरे पैमाने में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल पर दस्तक देने ये कौन आया है,&lt;br /&gt;किसकी आहट सुनता है वीराने में।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-1150558896920299583?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/1150558896920299583/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=1150558896920299583' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/1150558896920299583'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/1150558896920299583'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='...चांद ने कितनी देर लगा दी आने में'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SxVs9J7-BXI/AAAAAAAAAOg/LsSEwirAZFU/s72-c/gulzar3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-6614189805555075469</id><published>2009-11-28T11:43:00.000-08:00</published><updated>2009-11-28T11:45:11.966-08:00</updated><title type='text'>...हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आएंगे</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SxF9rGk7NFI/AAAAAAAAAOY/Oapo70OvwHU/s1600/dushyant-kumar.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 254px; height: 344px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SxF9rGk7NFI/AAAAAAAAAOY/Oapo70OvwHU/s400/dushyant-kumar.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5409242806902010962" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दुष्यंत कुमार की गजलें बहुत कुछ सोचने को विवश करती हैं। नई दिल्ली से प्रकाशित एक राष्ट्रीय दैनिक में शुक्रवार को प्रकाशित उनकी गजल मुझे तो काफी अच्छी लगी, शायद आपको भी भाए। डालिए एक नजर......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आएंगे, &lt;br /&gt;इस बूढ़े पीपल की छाया में सुस्ताने आएंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हौले-हौले पांव हिलाओ जल सोया है छेड़ो मत,&lt;br /&gt;हम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर अतीत के चक्रवात में दृष्टि न उलझा लेना तुम, &lt;br /&gt;अनगिन झोंके उन घटनाओं को दोहराने आएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेले में भटके होते होते तो कोई घर पहुंचा जाता, &lt;br /&gt;हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम क्यों बोलें इस आंधी में कई घरौंदे टूट गए, &lt;br /&gt;इन असफल निरमितियों के शव कल पहचाने जाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम इतिहास नहीं रच पाए इस पीड़ा में दहते हैं,&lt;br /&gt;अब जो धाराएं पकड़ेंगे इसी मुहाने आएंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-6614189805555075469?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/6614189805555075469/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=6614189805555075469' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/6614189805555075469'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/6614189805555075469'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='...हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आएंगे'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SxF9rGk7NFI/AAAAAAAAAOY/Oapo70OvwHU/s72-c/dushyant-kumar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-107205122206773459</id><published>2009-11-16T04:47:00.000-08:00</published><updated>2009-11-16T05:04:34.065-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बधाई हो बधाई'/><title type='text'>34वां काका हाथरसी पुरस्कार सुरेन्द्र दुबे को</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SwFLiawDTnI/AAAAAAAAAOQ/9ZKcr73m5bc/s1600/DSC_0369.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 276px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SwFLiawDTnI/AAAAAAAAAOQ/9ZKcr73m5bc/s400/DSC_0369.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5404684082489806450" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हास्य और व्यंग्य के क्षेत्र में विशिष्ट रचनात्मक योगदान के लिए सन् 2008 का काका हाथरसी पुरस्कार राजस्थान के अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हास्य कवि व्यंग्यकार सुरेन्द्र दुबे को गिरिराज धाम, गोवर्धन में आयोजित एक भव्य समारोह में प्रदान किया गया।&lt;br /&gt;काका हाथरसी पुरस्कार ट्रस्ट, हाथरस द्वारा प्रतिवर्ष एक सर्वश्रेष्ठ हास्य कवि को यह पुरस्कार प्रदान किया जाता है। इस शृंखला का यह 34वां पुरस्कार था। इसके अन्तर्गत सुरेन्द्र दुबे को शॉल, श्रीफल एवं एक लाख रुपए की राशि प्रदान की गई तथा -हास्य-रत्न- की उपाधि से अलंकृत किया गया। यह पुरस्कार उन्हें ट्रस्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी एवं प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. लक्ष्मीनारायण गर्ग ने प्रदान किया। इस अवसर पर देश के अनेक कवि-लेखक एवं पत्रकार मौजूद थे।&lt;br /&gt;समारोह को संबोधित करते हुए अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवयित्री डॉ. कीर्ति काले ने सुरेन्द्र दुबे को हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ हास्य कवि बताया। &lt;br /&gt;सुरेन्द्र दुबे ने समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि मेरी हास्य कविताएं आदमी की उदासी के खिलाफ ऐलान-ए-जंग हैं। मुझे प्रसन्नता है कि मैं आज काका हाथरसी के साहित्यिक परिवार का सदस्य घोषित हो गया हूं। कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध कवि डॉ. अशोक चक्रधर ने किया। उन्होंने कहा कि सुरेन्द्र दुबे की हास्य-व्यंग्य कविताएं एवं उनकी प्रस्तुति का अंदाज सबसे अनूठा है। दुनियाभर में जहां-जहां हिन्दी की कविता पहुंची है, वहां-वहां सुरेन्द्र दुबे के प्रशंसक मौजूद हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुरेन्द्र दुबे का परिचय&lt;br /&gt;राजस्थान के अजमेर जिले की केकड़ी तहसील के छोटे से ग्राम गुलगांव में जन्मे सुरेन्द्र दुबे की प्रारंभिक शिक्षा इसी ग्राम में हुई। फिर केकड़ी में पढ़े तथा कॉलेज शिक्षा ब्यावर से प्राप्त की। यही शहर उनकी पहचान बना। यहीं से उन्होंने कवि सम्मेलनों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। अब वे जयपुर में रहते हैं तथा कवि सम्मेलनों की पहली और अकेली पत्रिका -कवि सम्मेलन समाचार- के संपादक हैं। उनकी दो पुस्तकें -आओ निन्दा-निन्दा खेलें- और -कुर्सी तू बड़भागिनी-प्रकाशित हो चुकी हैं। वे अनेक दैनिक समाचार पत्रों में हास्य और व्यंग्य के स्तंभ भी लिखते रहते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-107205122206773459?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/107205122206773459/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=107205122206773459' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/107205122206773459'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/107205122206773459'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2009/11/34.html' title='34वां काका हाथरसी पुरस्कार सुरेन्द्र दुबे को'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/SwFLiawDTnI/AAAAAAAAAOQ/9ZKcr73m5bc/s72-c/DSC_0369.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-1700968223602022025</id><published>2009-10-04T13:03:00.000-07:00</published><updated>2009-10-04T13:05:23.882-07:00</updated><title type='text'>फलसफा जिंदगी का</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/Ssj_70cuqGI/AAAAAAAAANw/6MmxFn-HZpQ/s1600-h/nida.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 150px; height: 200px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/Ssj_70cuqGI/AAAAAAAAANw/6MmxFn-HZpQ/s200/nida.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5388838357305305186" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;लंबे समय बाद एक बार फिर अपने इस ब्लॉग में प्राणवायु डालने का प्रयास कर रहा हूं। शनिवार को दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक अखबार में प्रकाशित निदा फाजली की ये पंक्तियां दिल को छू गईं। आप भी पढ़कर देखिए, शायद अच्छी लगें - &lt;br /&gt;घर की तामीर चाहे जैसी हो&lt;br /&gt;इसमें रोने की कुछ जगह रखना।।&lt;br /&gt;जिस्म में फैलने लगा है शहर&lt;br /&gt;अपनी तन्हाइयां बचा रखना।।&lt;br /&gt;मस्जिदें हैं नमाजियों के लिए&lt;br /&gt;अपने दिल में कहीं खुदा रखना।।&lt;br /&gt;मिलना-जुलना जहां जरूरी हो&lt;br /&gt;मिलने-जुलने का हौसला रखना।।&lt;br /&gt;उम्र करने को है पचास को पार&lt;br /&gt;कौन है किस जगह पता रखना।।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-1700968223602022025?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/1700968223602022025/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=1700968223602022025' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/1700968223602022025'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/1700968223602022025'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='फलसफा जिंदगी का'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_vLBK8uS08-I/Ssj_70cuqGI/AAAAAAAAANw/6MmxFn-HZpQ/s72-c/nida.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-657166353941985575</id><published>2008-03-17T12:26:00.003-07:00</published><updated>2008-03-17T12:26:59.282-07:00</updated><title type='text'>जागो श्रोता जागो-दो</title><content type='html'>विश्व उपभोक्ता दिवस की पूर्व संध्या पर जयपुर के बिड़ला सभागार में आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन को डॉ. कुंअर बेचैन ने नई ऊंचाइयां बख्शीं :   &lt;br /&gt;हालांकि ये पंक्तियां पहले भी सुनी होंगी आपने, फिर भी प्रस्तुत हैं-&lt;br /&gt;ये सोच के मैं उम्र की ऊंचाइयां चढ़ा,&lt;br /&gt;शायद यहां, शायद यहां, शायद यहां है तू&lt;br /&gt;पिछले कई जन्मों से तुझे ढूंढ़ रहा हूं, &lt;br /&gt;जाने कहां, जाने कहां, जाने कहां है तू।&lt;br /&gt;आज के दौर में जब मित्रता भी स्वार्थ के वशीभूत की जा रही है,  &lt;br /&gt;डॉ. बेचैन ने सच्ची मित्रता की तमन्ना इन शब्दों में व्यक्त की - &lt;br /&gt;पूरी धरा भी साथ दे तो और बात है,&lt;br /&gt;पर तू जरा भी साथ दे तो और बात है।&lt;br /&gt;चलने को तो एक पांव से भी चल रहे हैं लोग,&lt;br /&gt;पर दूसरा भी साथ दे तो और बात है। &lt;br /&gt;और फिर होली पर उनके तेवर कुछ यूं थे -&lt;br /&gt;गमों की आंच पे आंसू उबालकर देखो,&lt;br /&gt;बनेंगे रंग किसी पर भी डालकर देखो।&lt;br /&gt;तुम्हारे çदल की चुभन भी जरूर कम होगी, &lt;br /&gt;किसी के पांव का कांटा निकालकर देखो। &lt;br /&gt;वो जिसमें लौ है विरोधों में और चमकेगा, &lt;br /&gt;किसी दीये पे अंधेरा उछालकर देखो। &lt;br /&gt;और अंत में उन्होंने प्रेम और परिश्रम के महत्व को इस तरह प्रतिपादित किया-&lt;br /&gt;सूखी मिट्टी से कोई भी मूरत न कभी बन पाएगी, &lt;br /&gt;जब हवा चलेगी ये मिट्टी खुद अपनी धूल उड़ाएगी।&lt;br /&gt;इसलिए सजल बादल बनकर बौछार के छींटे देता चल, &lt;br /&gt;यह दुनिया सूखी मिट्टी है तू प्यार के छींटे देता चल।&lt;br /&gt;यह पूरी कविता इतनी तरन्नुम में बह चली कि उसे लिखना संभव नहीं हो सका, कभी उपलब्ध हो पाएगी, तो आपकी सेवा में प्रस्तुत करूंगा।  &lt;br /&gt;और फिर आए डॉ. वसीम बरेलवी, जिन्होंने जिन्दगी के फलसफे को शेरों में पिरोकर जब पेश किया तो श्रोता मंत्रमुग्ध से हो गए:&lt;br /&gt;गरीब लहरों पे पहरे बिठाए जाते हैं, &lt;br /&gt;समंदरों की तलाशी कोई नहीं लेता।&lt;br /&gt;वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीके से,&lt;br /&gt;मैं एतवार न करता तो और क्या करता। &lt;br /&gt;हम ये तो नहीं कहते कि हम तुझसे बड़े हैं, &lt;br /&gt;लेकिन ये बहुत है कि तेरे साथ तेरे साथ खड़े हैं।&lt;br /&gt;अल्लाह मेरा बाग उजड़ने से बचाना, &lt;br /&gt;कुछ फूल भी कांटों की हिमायत में खड़े हैं।&lt;br /&gt;देते हैं वही फैसले तूफानों के रुख पर,&lt;br /&gt;जो एक जमाने से किनारों पे खड़े हैं। &lt;br /&gt;छोटी-छोटी बातें करके बड़े कहा हो जाओगे, &lt;br /&gt;पतली गलियों से निकलो तो खुली सड़क पर आओगे।&lt;br /&gt;मुझको गुनाहकार कहे और सजा न दे, &lt;br /&gt;इतना भी इख्तियार किसी को खुदा न दे।&lt;br /&gt;तखातुब में जो मेरे नाम का एलान हो जाए, &lt;br /&gt;तुम्हारा क्या बिगड़ता है मेरी पहचान हो जाए।&lt;br /&gt;किसी से कोई भी उम्मीद रखना छोड़कर देखो,&lt;br /&gt;तो ये रिश्ते निभाना किस कदर आसान हो जाए। &lt;br /&gt;शाम तक सुबह की नजरों से उतर जाते हैं, &lt;br /&gt;इतने समझौतों पे जीते हैं कि मर जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब्र का जहर कुछ भी हो पीता नहीं,&lt;br /&gt;मैं जमाने की शरतों पर जीता नहीं।&lt;br /&gt;देखे जाते नहीं मुझसे हारे हुए, &lt;br /&gt;इसलिए मैं कोई जंग जीता नहीं। &lt;br /&gt;कौन सी बात कहां कैसे कही जाती है, &lt;br /&gt;ये सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है।&lt;br /&gt;एक बिगड़ी हुई औलाद भला क्या जाने,&lt;br /&gt;कैसे मां-बाप के होठों से हंसी जाती है। &lt;br /&gt;साये तक की खुद्दारी को डॉ. वसीम ने बखूबी जुबां दिया : &lt;br /&gt;रोशनी से हैं दामन बचाए,&lt;br /&gt;कितने खुद्दार होते हैं साये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो सबपे बोझ था एक शाम जब नहीं लौटा, &lt;br /&gt;उसी परिंदे का शाखों को इंतजार रहा।&lt;br /&gt;उसूलों पर जहां आंच आए टकराना जरूरी है, &lt;br /&gt;जो जिंदा हो तो जिंदा नजर आना जरूरी है।&lt;br /&gt;नई उमरों की खुदमुख्तारियों को कौन समझाए, &lt;br /&gt;कहां से बचके चलना है कहां जाना जरूरी है। &lt;br /&gt;थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें,&lt;br /&gt;सलीकामंद शाखों का लचक जाना जरूरी है।&lt;br /&gt;मेरे होठों पर अपनी प्यास रख दो फिर सोचो,&lt;br /&gt;कि इसके बाद भी इस दुनिया में कुछ पाना जरूरी है।&lt;br /&gt;सलीका ही नहीं शायद उसे महसूस करने का, &lt;br /&gt;जो कहता है खुदा है तो नजर आना जरूरी है।&lt;br /&gt;बहुत बेबाक आंखों में ताल्लुक टिक नहीं पाता, &lt;br /&gt;मोहब्बत में कशिश रखने को शरमाना जरूरी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और फिर स्वाभिमानियों के लिए उन्होंने कुछ यूं फरमाया-&lt;br /&gt;क्या दुख है समंदर को बता भी नहीं सकता, &lt;br /&gt;आंसू की तरह आंख तक आ भी नहीं सकताष &lt;br /&gt;तू छोड़ रहा है तो खता इसमें तेरी क्या, &lt;br /&gt;हर शख्स मेरा साथ निभा भी नहीं सकता। &lt;br /&gt;प्यासे रहे जाते हैं जमाने के सवालात, &lt;br /&gt;किसके लिए जिंदा हूं बता भी नहीं सकता।&lt;br /&gt;घर ढूंढ रहे हैं मेरा रातों के पुजारी, &lt;br /&gt;मैं हूं कि चिरागों को बुझा भी नहीं सकता।&lt;br /&gt;वैसे तो एक आंसू ही बहाकर मुझे ले जाए, &lt;br /&gt;ऐसे कोई तूफान हिला भी नहीं सकता। &lt;br /&gt;डॉ. वसीम बरेलवी ने तरन्नुम में भी कुछ सुनाया, वह रचना और कभी। तब तक के लिए शुभकामनाएं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-657166353941985575?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/657166353941985575/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=657166353941985575' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/657166353941985575'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/657166353941985575'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2008/03/blog-post_17.html' title='जागो श्रोता जागो-दो'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-5862438200759148122</id><published>2008-03-16T12:36:00.001-07:00</published><updated>2008-03-16T12:37:58.194-07:00</updated><title type='text'>जागो श्रोता जागो-एक</title><content type='html'>विश्व उपभोक्ता दिवस की पूर्व संध्या पर शुक्रवार को राजस्थान के खाद्य, नागरिक आपूर्ति और उपभोक्ता मामलों के विभाग ने बिड़ला सभागार में राष्ट्रीय कवि सम्मेलन का आयोजन किया। इसमें कई कवियों ने सार्थक संदेश देने का सफल प्रयास किया। तो बिना किसी भूमिका के उठाइए इन काव्य पंक्तियों का आनंद ----&lt;br /&gt;सर्वप्रथम भोपाल से आईं डॉ. अनु सपन ने सरस्वती वंदना से कवि सम्मेलन की शुरुआत की। कवि सम्मेलन के संचालक शैलेष लोढ़ा ने विभागीय अधिकारी शिवदत्त पालीवाल को बुलाया, जिन्होंने कार्यक्रम की सार्थकता बनाए रखने के लिए काव्य के जरिये उपभोक्ता संरक्षण का संदेश दिया। इसके बाद जयपुर के अब्दुल अयूब गौरी ने रामसेतु पर विवाद और भगवान श्रीराम के अस्तित्व पर सवाल उठाने वालों को ललकारा-&lt;br /&gt;`राम के वजूद पे जो लगा रहे प्रश्नचिह्न&lt;br /&gt;उनके मरने पर न राम नाम सत्य हो।´ &lt;br /&gt;इसके बाद भोपाल से आए नसीर परवाज ने अंधेरों के बीच उजाले की उम्मीद कुछ इस तरह जगाई-&lt;br /&gt;बुझ गया है चांद तो सूरज निकलना चाहिए,&lt;br /&gt;मैं जहां जाऊं उजाला साथ चलना चाहिए।&lt;br /&gt;राह का पत्थर उठा तो लूं मगर ये शर्त है,&lt;br /&gt;उसकों हाथों की हरारत से पिघलना चाहिए।&lt;br /&gt;हालांकि उनके आक्रोश का तेवर भी छिपा नहीं रह सका&lt;br /&gt;कम से कम लोगों को मेरे गम का अंदाजा तो हो,&lt;br /&gt;मेरे घर के साथ सारा शहर जलना चाहिए।&lt;br /&gt;खत्म हो जाए जहां मेरी सदाकत का सफर,&lt;br /&gt;उससे आगे फिर मेरे बच्चों को चलना चाहिए।&lt;br /&gt;कुछ जरूरी तो नहीं ताउम्र वो अच्छा लगे, &lt;br /&gt;दिल बदल जाए तो चेहरा भी बदलना चाहिए।&lt;br /&gt;कोई मजबूरी भी हो लेकिन खिलौनों के लिए,&lt;br /&gt;हर घड़ी मासूम बच्चों को मचलना चाहिए। &lt;br /&gt;बैठकर संजीदगी से गौर करना है हमें,&lt;br /&gt;जिंदगी को किस नए सांचे में ढलना चाहिए। &lt;br /&gt;इनके बाद हाड़ौती के कवि दुरगादानसिंह गौड़ ने राजस्थानी भाषा में शृंगार की कविताओं से श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया। फिर सुरेंद्र सुकुमार ने छोटी-छोटी क्षणिकाओं के बाद अपनी प्रसिद्ध रचना `रैट कमीशन´ से वर्तमान राजनीति में व्याप्त विद्रूपताओं का बड़ा ही सटीक चित्रण किया। &lt;br /&gt;मंचासीन इकलौती कवयित्री भोपाल से आईं डॉ. अनु सपन ने प्रेम-प्रीत की बात कुछ इस अंदाज में की-&lt;br /&gt;देखो कितने सितार बजते हैं, सारे नगमे निगार बजते हैं।&lt;br /&gt;जब से तुमने मुझे निहारा है, मुझमें घुंघरू हजार बजते हैं।&lt;br /&gt;आप से दूर रह नहीं पाते, अब ये तन्हाई सह नहीं पाते।&lt;br /&gt;मेरी पलकों को आप पढ़ लेना, होठ कायर हैं कह नहीं पाते।&lt;br /&gt;सबको देते नजीर देखे हैं, हमने हरदम अधीर देखे हैं।&lt;br /&gt;प्रेम के मानी तक नहीं आते, खुद को कहते कबीर देखे हैं।&lt;br /&gt;प्रीत का छंद पा लिया हमने, मन का आनंद पा लिया हमने।&lt;br /&gt;आपके बोल पढ़ लिए जबसे, गीत गोविंद गा लिया हमने।&lt;br /&gt;याद जब-जब तुम्हारी आती है, आंख एक छंद गुनगुनाती है।&lt;br /&gt;रात पढ़ती है प्रेम के दोहे, धूप चौपाइयां सुनाती है।&lt;br /&gt;और इसके बाद विरह की वेदना और मोहब्बत की रीत ने इन शब्दों का सहारे श्रोताओं के çदल में उतरने की कोशिश की-&lt;br /&gt;जलती है शमां जैसे तिल-तिल पिघल-पिघल के,&lt;br /&gt;काटी है रात हमने करवट बदल-बदल के।&lt;br /&gt;पग-पग पर इस सफर में बरसेंगे तुझपे पत्थर,&lt;br /&gt;ये प्यार की डगर है चलना संभल-संभल के। &lt;br /&gt;किसको मैं समझूं अपना किसको कहूं पराया,&lt;br /&gt;मिलते हैं दोस्त भी अब चेहरे बदल-बदल के।&lt;br /&gt;आया खिलौने वाला मजबूर बाप रोया,&lt;br /&gt;उंगली छुड़ा रहे थे बच्चे मचल-मचल के।&lt;br /&gt;कुछ दूर साथ चलके हम इस तरह से बिछड़े, &lt;br /&gt;रह जाएं जो अधूरे मिसरे किसी गजल के। &lt;br /&gt;और इसके बाद हुस्न ने मजनू छाप आशिकों से औरत की असली परिभाषा कुछ यूं दी-&lt;br /&gt;इस तरह से मुझे आप मत देखिए, भाव सूची नहीं हूं मैं बाजार की। &lt;br /&gt;मेरी हर सांस में एक उपन्यास है, कोई कतरन नहीं हूं मैं अखबार की।&lt;br /&gt;सिर्फ चेहरा ही सब देखते हैं यहां, नापते हैं कहां मन की गहराइयां।&lt;br /&gt;रूप रस के ये लोभी नहीं जानते, मन में बसती है मानस की चौपाइयां।&lt;br /&gt;मूर्तियां पूजना मेरी फितरत नहीं, मैं पुजारिन पसीने के किरदार की।&lt;br /&gt;मैं कुहासे में लिपटी हुई भोर हूं, कोई सूरज मिले मैं भी खिल जाऊंगी।&lt;br /&gt;हूं नदी भावना की उमड़ती हुई, एक çदन अपने सागर से मिल जाऊंगी।&lt;br /&gt;प्यार मैंने किया पूरे मन से किया, फिक्र मुझको नहीं जीत की हार की।&lt;br /&gt;देवियों की तरह जिनको पूजा गया, या सभाओं में जिनको नचाया गया। &lt;br /&gt;एक औरत को और न समझा गया, इक शमां की तरह से जलाया गया। &lt;br /&gt;मैं धरा हूं धरम है सहन शीलता, कोई वस्तु नहीं हूं मैं व्यापार की। &lt;br /&gt;और इसके बाद जयपुर के ही वीर रस के कवि अब्दुल गफ्पार ने अपने बदले हुए तेवर में पाकिस्तान को ललकारने की बजाय देश में ही देशवासियों के बीच जहर घोलने वाले राज ठाकरे को कड़े शब्दों में चुनौती दी कि भारत एक है और सबका है। &lt;br /&gt;दो कवि और शेष हैं इस कवि सम्मेलन के और दोनों ही विशेष हैं, लेकिन इनकी काव्यरचना के रसास्वादन के लिए कीजिए थोड़ा और इंतजार।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-5862438200759148122?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/5862438200759148122/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=5862438200759148122' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/5862438200759148122'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/5862438200759148122'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2008/03/blog-post.html' title='जागो श्रोता जागो-एक'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-2661888325391687913</id><published>2008-02-09T10:39:00.000-08:00</published><updated>2008-02-09T10:49:40.120-08:00</updated><title type='text'>मिले बस इतना ही...</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_vLBK8uS08-I/R6306HYwAnI/AAAAAAAAAEw/eh7aqmoORcY/s1600-h/photo.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_vLBK8uS08-I/R6306HYwAnI/AAAAAAAAAEw/eh7aqmoORcY/s320/photo.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5165053626916274802" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जन्म दिवस पर संजीव मिश्र को श्रद्धांजलि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुमुखी प्रतिभा के धनी संजीव मिश्र पिछले वर्ष 28 जनवरी को हम सबको असमय अलविदा कह गए। पेशे से पत्रकार संजीव मिश्र ने कहानियां, व्यंग्य, समीक्षा, अनुवाद, गीत-गजल, कविता, फीचर लेखन सभी विधाओं में अपनी उपस्थिति जताई और प्रशंसकों ही नहीं, आलोचकों के बीच भी चर्चा में रहे। कुछ शब्द जैसे मेज, लहर भर समय और मिले बस इतना ही नाम से उनके तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। गंगा के जल से गंगा को अघ्र्य देने के धर्म को निभाते हुए उनके काव्य संग्रह `मिले बस इतना ही´ से कुछ कविताएं प्रस्तुत हैं: &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उचित दूरी बनाए रखें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जितने स्विच ऑन करो&lt;br /&gt;उतना ही बढ़ता है&lt;br /&gt;मन में अंधेरा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतनी कितनी घुटन&lt;br /&gt;कि सांस लेने भर के लिए &lt;br /&gt;हर किसी को&lt;br /&gt;सीखना पड़ता है &lt;br /&gt;प्राणायाम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गलत तय हो चुका है&lt;br /&gt;बिना हासिल का&lt;br /&gt;हर जोड़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भुलाई जा चुकी है&lt;br /&gt;शब्दों की चौकड़ी &lt;br /&gt;भरने में लगे हैं सब&lt;br /&gt;अंकों को सु-डू-कू के &lt;br /&gt;जाल में &lt;br /&gt;कस कर बुनते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेटवरकिंग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने ही चारों ओर &lt;br /&gt;कि कहीं भर न ले&lt;br /&gt;बांहों में&lt;br /&gt;जिंदगी की कोई &lt;br /&gt;छोटी सी सच्चाई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लिखी है सामने भागती&lt;br /&gt;गाड़ी पर चेतावनी&lt;br /&gt;`उचित दूरी बनाए रखें´&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह नहीं लिखा&lt;br /&gt;कि कितनी दूरी&lt;br /&gt;उचित है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और अजीब बात यह है &lt;br /&gt;कि इतनी बड़ी&lt;br /&gt;आबादी में&lt;br /&gt;दूरी बनाए रखना &lt;br /&gt;उचित है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस इतना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिता से उठी&lt;br /&gt;प्रखर&lt;br /&gt;प्रभामय&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आकाश की ओर लपकी&lt;br /&gt;लपट-सा&lt;br /&gt;जीवन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धुली धूप में&lt;br /&gt;थमी हवा की&lt;br /&gt;शीतलता सी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौत&lt;br /&gt;और अपने होने का बोध&lt;br /&gt;मिले&lt;br /&gt;बस इतना ही।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-2661888325391687913?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/2661888325391687913/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=2661888325391687913' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/2661888325391687913'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/2661888325391687913'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2008/02/blog-post.html' title='मिले बस इतना ही...'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp3.blogger.com/_vLBK8uS08-I/R6306HYwAnI/AAAAAAAAAEw/eh7aqmoORcY/s72-c/photo.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-2051556835298182862</id><published>2008-01-23T11:44:00.000-08:00</published><updated>2008-01-23T11:46:13.252-08:00</updated><title type='text'>बी पॉजिटिव, बी एवरयंग</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_vLBK8uS08-I/R5eZcxwyATI/AAAAAAAAAEo/ULLwglkksK0/s1600-h/devanand_big.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_vLBK8uS08-I/R5eZcxwyATI/AAAAAAAAAEo/ULLwglkksK0/s320/devanand_big.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5158760617849520434" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;आनंद ही है देव आनंद के चिरयौवन का रहस्य &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसा कि मैंने पहले बताया था कि इन दिनों गुलाबी नगरी में साहित्य का महाकुंभ-विरासत साहित्य उत्सव-आयोजित किया जा रहा है। देशभर से विभिन्न भाषाओं के लेखक इसमें शिरकत कर रहे हैं। इनके साथ विदेशी विद्वान और नामी-गिरामी प्रकाशक भी साहित्य और साहित्यकारों से जुड़ी विभिन्न संभावनाओं पर विचार-विमशॅ कर रहे हैं। अब आयोजन बड़ा है तो साहित्य जगत की हस्तियों के बावजूद सेलिब्रिटीज को इग्नॉर कैसे किया जा सकता है। सो, सेलिब्रिटीज भी बुलाए जा रहे हैं। इसी कड़ी में बुधवार को मैन ऑफ द ओकेजन बने रहे फिल्मी दुनिया के चिरयुवा देव आनंद साहब। &lt;br /&gt;आयोजकों ने देव आनंद साहब से बातचीत के लिए चेन्नई की युवा लेखिका और नतॅकी तथा दिखने में कमसिन और आकषॅक बाला तिशानी दोषी को अप्वायंट किया हुआ था। करीब एक घंटे तक चले कायॅक्रम में तिशानी ने देव आनंद साहब के जीवन, फिल्मों और उनकी आत्मकथा-रोमांसिंग विद लाइफ- के बारे में बातचीत की। श्रोताओं की जिज्ञासाओं से भरे सवालों के देव साहब ने बखूबी जवाब दिए। पूरी बातचीत के दौरान मैं जितना समझ पाया वह यह था कि पॉजिटिवनेस की ऊरजा इस शख्स में कूट-कूटकर भरी हुई है और वे अपने चाहने वालों को भी एक ही संदेश देते हैं-बी पॉजिटिव ऑलवेज़। &lt;br /&gt;उन्होंने कहा कि 1943 में लाहौर के गवनॅमेंट कॉलेज से इंग्लिश में बीए ऑनसॅ और एमए करने के बाद जब वे बॉम्बे (आज की मुंबई) आए थे, तो उनकी जेब में महज 13 रुपए थे,  लेकिन उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा, हिम्मत हारने का तो सवाल ही नहीं था, दो साल तक जमकर संघषॅ किया, फिर कदम आगे बढ़ते गए और देव साहब एक के बाद सफलता के परचम लहराते रहे। उन्होंने कहा कि वे कम्प्यूटर नहीं जानते, इसलिए उन्होंने अपनी आत्मकथा की पांडुलिपि कलम से ही लिखी है। जब वे इसे लिखने बैठते थे तो मन में और कोई ख्याल आता ही नहीं था। एक बार दिल से ठान लो तो कुछ भी मुश्किल नहीं होता। उनका कहना था कि जीवन के किसी दौर में कठिनाई तभी घर बना पाती है, जब हम अपने दिमाग में उसे पैठ बनाने की छूट देते हैं। ऐसा नहीं करने पर कोई भी बाधा हमें मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकती। अपनी एचीवमेंट से आदमी को कभी संतुष्ट नहीं होना चाहिए और इससे भी बेहतर करने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। &lt;br /&gt;अपने शरमीले स्वभाव के बारे में पूछने पर देव आनंद साहब का कहना था कि यह एक अच्छा गुण है औऱ आज भी मेरे सामने कोई कमसिन हसीना आ जाए तो मैं शरमा जाऊंगा। &lt;br /&gt;55 साल बाद अपनी लाहौर यात्रा की चरचा छिड़ने पर देव साहब भावुक हो उठे। उन पलों को याद करते हुए उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी,  पाक प्रधानमंत्री नवाजशरीफ औऱ भारत-व पाकिस्तान में सड़क के किनारे खड़ी भीड़ के स्वागत के क्षणों को भी याद किया। उन्होंने बताया कि इस यात्रा के दौरान वे लाहौर गवनॅंमेंट कॉलेज भी गए, जहां के छात्र-छात्राओं ने उन्हें हृदय से प्यार किया। देव आनंद ने फिल्म डायरेक्टर और अपने सबसे अजीज दोस्त गुरुदत्त से जुड़े संस्मरण भी श्रोताओं से शेयर किए। देव आनंद साहब ने नेपाल के तत्कालीन राजा महेंद्र, वीरेंद्र और ज्ञानेंद्र से जुड़े संस्मरण भी सुनाए। &lt;br /&gt;उनका कहना था कि बुरे अनुभवों को न तो दिमाग में रखो और न आत्मा में उतरने दो। थिंकिंग ऑफ प्रेजेंट-हेयर एंड नाऊ-हमेशा अच्छा सोचो रहो और वतॅमान में जिओ। &lt;br /&gt;फिल्मों के बारे में उनकी बेबाक राय थी कि जो फिल्म कोई संदेश न दे सके, वह फिल्म बेकार है औऱ उसे फिल्म कहलाने का हक नहीं है। लेकिन फिल्म में संदेश ही होना चाहिए, उपदेश नहीं। दुनिया में कोई भी किसी का लेक्चर सुनना नहीं चाहता क्योंकि वह समझता है कि मैं ज्यादा जानता हूं। उन्होंने बताया कि वे कुछ ही दिनों में अपनी नई फिल्म-चाजॅशीट-पर काम करेंगे। इसके अलावा वे अंग्रेजी में भी एक फिल्म बनाएंगे, ताकि पश्चिम वाले भी पूरब की क्वालिटी को देखें-परखें। बात-बेबात छींटाकशी करने वालों पर देव आनंद का बस इतना ही कहना था कि वही बोलेंगे जिनके पास वक्त है और काम नहीं है,  जो व्यस्त हैं, वे कैसे बोलेंगे। &lt;br /&gt;किताबों से देव साहब को विशेष प्रेम है और वे स्वाध्याय के तगड़े हिमायती हैं। उन्होंने कहा कि जो आपको किताबों ने दिया है, आप उसी को जी रहे हैं। आदमी को अच्छी किताबें जरूर पढ़नी चाहिए औऱ जब भी समय मिले, उसका सदुपयोग पढ़ने में करना चाहिए। एडूकेट योरसेल्फ ऐज यू कैन। उनका कहना था कि अच्छी किताबों पर फिल्में बनना सोने पे सुहागा के समान है। मोशन फिल्म मेकिंग को उन्होंने पिछली शताब्दी की सबसे महत्वपूणॅ खोज बताया। देव साहब ने कहा कि फिल्में क्या नहीं दिखाती हैं-प्रेम कहानी, विरह व्यथा, हृदय की पीड़ा, प्राकृतिक दृश्य औऱ भी वह सब कुछ जो आप देखना चाहते हैं और जिसे देखने के बाद आप तरो-ताजा हो उठते हैं। उनका कहना था कि अच्छी कहानी अच्छी फिल्म की आत्मा होती है। यह पूरी तरह से डायरेक्टर की तपस्या का परिणाम होती है। वह ध्यान रखता है कि अभिनेता, अभिनेत्री, संवाद, नृत्य, स्टोरी, सीन, सिचुएशन और भी कई सारी बातों को किस तरह पेश करना है कि दशॅकों को ढाई घंटे तक मनोरंजन दिया जा सके। &lt;br /&gt;तकरीबन डेढ़ घंटे देव साहब के सान्निध्य में रहने के दौरान मैंने यही पाया कि 26 सितंबर 1923 को पैदा हुए इस इंसान में जिंदादिली का माद्दा कूट-कूटकर भरा हुआ है। चाहे पत्रकारों के सवाल हों या ऑटोग्राफ लेने वालों की भीड़ या फिर कायॅक्रम के दौरान श्रोताओं के सवाल, किसी भी क्षण उनके चेहरे पर तनाव का नामोनिशान नहीं था। इतनी ख्याति मिलने के बाद भी आम आदमी की कद्रदानी इस कदर कि बेबाक कहा कि कि मैं भी आप जैसा ही हूं। आज भी कोई फोन करता है तो लंबे-चौड़े स्टाफ के अमले के बावजूद खुद ही फोन उठाता हूं,  कोई मिलना चाहे तो कभी मना नहीं करता, आखिर अपने चाहने वाले को मना करने का अधिकार मुझे किसने दिया है।  कोई कुछ पूछना चाहे तो उसकी जिज्ञासा को शांत करने के लिए हर पल तत्पर। पूरे कायॅक्रम के दौरान उनका दाशॅनिक अंदाज देखते ही बनता था। एवरयंग-चिरयुवा होने के सवाल पर देव साहब का कहना था कि बुरी चीजों को मैं तुरत भूल जाता हूं, इसलिए मैं मैं हूं....एंड यू मे बी सो.....बी पॉजिटिव, बी एवरयंग। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्छा तो बहुत लगा पर कुछ बातें खली भी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरे कायॅक्रम के दौरान हॉल में लगाए दो छोटे परदे पर प्रोजेक्टर के माध्यम से देव आनंद साहब की चुनिंदा फिल्मों के महत्वपूणॅ दृश्य लगातार दिखाए जा रहे थे, बिना ध्वनि के। हां, गीतों और संवाद के अंग्रेजी अनुवाद परदे पर दिखाई दे रहे थे, लेकिन उन पर ध्यान किसका था, लोगों की निगाहें तो मफलर लपेटे देव आनंद साहब पर ही टिकी हुई थीं और कान उनके शब्दों को सुनने को आप्यायित। तिशानी दोषी चूंकि चेन्नई से बिलांग करती हैं, सो उन्होंने हिंदी में सवाल करने में असमथॅता जता दी थी, जबकि अधिकतर श्रोता अपने पसंदीदा अभिनेता देव साहब को हिंदी में सुनना चाहते थे। आखिरकार हिंदी फिल्मों के सहारे ही तो देव साहब इस मुकाम पर पहुंचे हैं। समझदार लोगों ने तो मोबाइल को साइलेंट मोड पर कर रखा था या फिर स्विच ऑफ ही कर दिया था, लेकिन कुछ बददिमागों के मोबाइल की रिंगटोन बजने से ऐसा ही अहसास होता था जैसे सुस्वादु खीर खाते हुए मुंह में कंकड़ आ जाए, बुरा तो आम श्रोताओं और मेजबानों के साथ इस हैंडसम मेहमान को भी लगा ही होगा, लेकिन उनकी आदत है कि बुराई को वे याद नहीं रखते, मैं तो भूल नहीं पाया सो निकल गई यह बात भी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आमिर भी आएंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विरासत फाउंडेशन की ओर से आयोजित इस विरासत साहित्य उत्सव में 25  जनवरी को आमिर खां की हर दिल अजीज फिल्म तारे जमीं पर दिखाई जाएगी और 26 जनवरी को आमिर खां स्वयं इस कायॅक्रम में शिरकत करेंगे। वे इस फिल्म से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपनी बात रखेंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-2051556835298182862?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/2051556835298182862/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=2051556835298182862' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/2051556835298182862'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/2051556835298182862'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2008/01/blog-post_23.html' title='बी पॉजिटिव, बी एवरयंग'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp2.blogger.com/_vLBK8uS08-I/R5eZcxwyATI/AAAAAAAAAEo/ULLwglkksK0/s72-c/devanand_big.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-1356318562738694875</id><published>2008-01-22T10:59:00.000-08:00</published><updated>2008-01-22T11:10:28.663-08:00</updated><title type='text'>साहित्यकारों का मेला गुलाबी नगर में</title><content type='html'>दो संस्थाओं की ओऱ से जयपुर में इन दिनों साहित्य का महाकुंभ आयोजित किया जा रहा है। 20 जनवरी की शाम उज्जैन (मध्यप्रदेश) के लोकगायक प्रहलाद सिंह तिपनिया और उनके साथियों ने कबीर के दोहों और साखियों के गायन से इस कायॅक्रम का शुभारंभ किया, जबकि 21 जनवरी की सुबह डिग्गी पैलेस होटल में इसकी औपचारिक शुरुआत हुई। यहां होने वाले विभिन्न सत्रों में देशभर से आए साहित्यकार विभिन्न विषयों पर अपना पक्ष रख रहे हैं। तकनीकी समृद्धि के इस युग में प्रोजेक्टर के सहारे प्रजेंटेशन की भी मदद ली जा रही है। ...और यह सब देखने-सुनने के लिए साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों की भी भीड़ जुट रही है। 27 जनवरी तक यह महाकुंभ चलेगा। &lt;br /&gt; जयपुर से प्रकाशित हिंदी दैनिक समाचार पत्र डेली न्यूज के 21 जनवरी के अंक में प्रकाशित आलेख में साहित्यकार प्रेमचंद गांधी ने इस आयोजन को अपने नजरिये से देखा। आप भी देखें उनके विचार जस के तस---&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत का इंडिया में अनुवाद! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैश्वीकरण के इस दौर में हम देख रहे हैं कि किस तरह आम आदमी की पहुंच वाली चीजों को बडे़ पूंजीपति और कॉरपोरेट घराने हथिया कर भव्य शॉपिंग मॉल और बाजारों में न केवल ले जाते हैं, बल्कि एक खास तरह से चीजों की ब्रांडिंग कर एक बडे़ समुदाय को उनसे वंचित भी कर देते हैं। मसलन किसी मॉल में एक मजदूर घुसने की हिम्मत भी नहीं कर सकता है। चीजों को सर्वसुलभ बनाने के नाम पर पूंजी का यह शर्मनाक खेल जारी है और हम असहाय हैं। दुरभाग्य से मुनाफाखोरी वाले वैश्वीकरण के इस कुचक्र में अब भारतीय संस्कृति के वे सब अंग-उपांग भी आ गए हैं, जिन्हें अब तक बिक्री योग्य नहीं माना जाता था।&lt;br /&gt;सबसे पहले संगीत इस प्रवृत्ति का शिकार हुआ। प्रतिभा खोज के नाम पर चैनलों की संगीत प्रतियोगिताएं किस प्रकार संगीत का कबाड़ा कर चुकी हैं, किसी से छिपा नहीं है। रीमिक्स के नाम पर हमारे लोक, शास्त्रीय और सुगम संगीत से लेकर भक्ति संगीत तक को पाश्चात्य प्रदूषण में इस कदर डुबो दिया गया है कि असली संगीत पता नहीं कहां लुप्त हो गया है। नृत्यों की भी यही हालत है और रंगमंच की क्रांतिकारी जनोन्मुखी विधा `नुक्कड़ नाटक´ अब कंपनियों के सामान बेचने के काम आ रही है। अब साहित्य की बारी है और यकीन मानिए इसकी शुरुआत हो चुकी है।&lt;br /&gt;इन दिनों राजधानी जयपुर में साहित्य का एक बड़ा भव्य प्रायोजित उत्सव चल रहा है। इस उत्सव में भारत को अनुवाद कर अंतिम तौर पर इंडिया बनाने की कॉरपोरेट, ग्लोबल, सरकारी और गैर सरकारी कोशिशें की जा रही हैं। आजादी के साठ साल में यह हाई फाई जश्न मूलत: वैश्वीकरण के दौर में चल रही अनेक प्रवृत्तियों का प्रतीक हैं और एक नए किस्म के औपनिवेशिक भारत बनाने की कुल जमा में साहित्यिक साजिश है। साजिश इसलिए, क्योंकि इसमें, वैश्वीकरण की प्रक्रिया में भारतीय भाषाएं किस तरह बाजार का हिस्सा बन सकती हैं, इस पर जोर दिया गया है अरथात भूमंडलीकरण में भारतीय भाषाएं किस तरह मुनाफाखोरों का भला कर सकती हैं। पिछले दिनों संयोग से इस लेखक से एक ऐसी कंपनी ने अनुवाद के लिए संपर्क किया, जो गांवों में इंटरनेट के माध्यम से ऑनलाइन व्यापार करना चाहती है। कंपनी का आग्रह था कि अनुवाद ग्रामीण भारत के लोगों के अनुरूप होना चाहिए। ट्रांसलेटिंग भारत इसी तरह भारत को अनुवाद के माध्यम से एक बड़ा बहुभाषी बाजार बनाने की प्रक्रिया का पहला चरण है।&lt;br /&gt;इस कथित साहित्य उत्सव का केन्द्रीय विषय है - भाषा भूमंडलीकरण और पढे़ जाने का अधिकार। भाषा और भूमंडलीकरण का अत्यंत गहरा संबंध है। स्वतंत्रता संघर्ष के दौर में हम जानते हैं कि अंग्रेजों ने हम पर राज करने के लिए भाषा को ही एक माध्यम बनाया था। उन्होंने हमारी प्राचीन और वर्तमान तमाम भाषाओं का गहरा अध्ययन किया था। हमारी सांस्कृतिक परम्पराओं के अध्ययन के आधार पर ही उन्होंने हमारे ऊपर शासन करने के अनेक तरीके खोजे थे। भूमंडलीकरण के इस दौर में या कहें कि नव औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के इस दौर में भारतीय भाषाओं का विपुल साहित्य अंग्रेजी के माध्यम से दुनिया में जाना चाहिए और इसी तरह अंग्रेजों व अन्य भाषाओं से भारतीय भाषाओं में आना चाहिए। दुरभाग्य से इस उत्सवधर्मी प्रायोजित साहित्यिक उपक्रम में जो प्रकाशक भागीदार हैं, वे मुख्यत: अंग्रेजी या हिन्दी के हैं। इसलिए उनसे यह अपेक्षा तो नहीं की जा सकती कि वे विश्व साहित्य को भारतीय भाषाओं में मसलन राजस्थानी में भी छापने के लिए उत्सुक होंगे। मुनाफाखोर अंग्रेजी प्रकाशक भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में चाहता है कि वह दुनिया का उत्कृष्ट साहित्य अनुवाद के माध्यम से छाप कर और बड़ा बनता जाए। इस अनूदित साहित्य से भारतीय भाषाओं का कोई भला नहीं होने वाला, क्योंकि अनुवाद पर अनुवादक का कॉपीराइट नहीं होता, वह एकमुश्त भुगतान के माध्यम से प्रकाशक खरीद लेता है और पीढ़ियों तक कमाता रहता है। अनुवादक और मूल भाषा बहुत पीछे छूट जाती है।&lt;br /&gt;इस उत्सव के निमंत्रण पत्र के तौर पर महंगे आर्ट पेपर पर बहुरंगी छपाई वाली पचास से ज्यादा पृष्ठों की मोटी बुकलेट में इस बात पर जोर दिया गया है कि भूमंडलीकरण के दौर में भारतीय साहित्य को अनुवाद के माध्यम से प्रतिष्ठित किए जाने की जरूरत है। भारतीय अर्थव्यवस्था के बढ़ते प्रभाव और महत्व को भी इस संदर्भ में रेखांकित किया गया है। इस तरह भारतीय अथॅव्यवस्था, भारतीय साहित्य और भारतीय भाषाएं भूमंडलीकरण की बहुराष्ट्रीय मुनाफाखोर संस्कृति के लिए एक अनिवार्य उपकरण के रूप में इस्तेमाल की जा रही है। इस तरह इस पूरे आयोजन का मंतव्य स्पष्ट हो जाता है।&lt;br /&gt;हम अनुवाद के विरोधी नहीं हैं, लेकिन हम जानते हैं कि भारत एक बहुभाषी संस्कृतियों का देश है। हम चाहते हैं कि उत्तर पूर्व का साहित्य हिन्दी और अंग्रेजी में ही नहीं, राजस्थानी, गुजराती, उडि़या, मराठी यानि तमाम भारतीय भाषाओं में भी आए। इसी तरह भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद का यह काम होना चाहिए, लेकिन पेंग्विन, हार्पर कॉलिन्स जैसे प्रकाशकों की इसमें क्यों रुचि होगी?&lt;br /&gt;रुचि तो दरअसल ऐसे किसी काम में उन कॉरपोरेट किस्म के प्रायोजकों की भी नहीं होगी, जो इस पूरे आयोजन में भागीदार हैं। अब आप ही बताइए कि रीयल एस्टेट, टे्रवल एजेंट, टेलीफोन, माबॅल, सीमेंट और होटल इंडस्ट्री का साहित्य से क्या लेना देना है? ज्यादातर के लिए साहित्य इंटीरियर डिजाइन का एक हिस्सा है। क्योंकि एक अलमारी में किताबें रखी होने से घर, दफ्तर सुंदर लगता है और वहां रहकर काम करने वालों को एक बौद्धिक आभा प्रदान करता है। यह सही है कि इतने बडे़ और भव्य आयोजन के लिए संसाधन जुटाने के लिए बहुत से प्रायोजकों की मदद ली गई है, लेकिन आयोजन के कुप्रबंध का इस बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि इस लेखक के पास दो साल पुराने पते पर एक साथ, एक ही कोरियर कंपनी द्वारा कुल सात निमंत्रण भेजे गए। इसी तरह अन्य लेखक मित्रों के पास तीन से लेकर आठ तक निमंत्रण पहुंचे। यह तो सरासर धन का अपव्यय है और साहित्य के नाम पर निश्चित रूप से कागज की बरबादी है।&lt;br /&gt;दो साल से जयपुर विरासत फाउंडेशन भी इसी प्रकार का एक साहित्य उत्सव आयोजित करता आ रहा है। इस बार वह उत्सव इस आयोजन में अनुवाद की पूंछ बन गया है। कहने का आशय यह कि कुल आठ दिन के आयोजन में तीन दिन भूमंडलीकण में अनुवाद के नाम और पांच दिन विरासत का तामझाम। अब इस तामझाम में भारत कहां है? यह देखने की कोशिश की तो पता चला कि लगभग नब्बे लेखक-पत्रकारों में से साठ तो सिर्फ अंग्रेजी के हैं और बाकी तमाम भारतीय भाषाओं के। आठ दिन के उत्सव में कुल आठ हिन्दी के हैं और तीन राजस्थानी के। यह है भारत का अनुवाद और साहित्य की विरासत।&lt;br /&gt;चूंकि आयोजन राजस्थान की राजधानी में हो रहा है, इसलिए निवेदन करना जरूरी है कि देश के सबसे बडे़ प्रान्त से मात्र पांच लेखकों को चुना गया है। नंद भारद्वाज, चन्द्र प्रकाश देवल, मालचंद तिवाड़ी और गिरिराज किराडू के अलावा इतिहासकार रीमा हूजा हैं। निश्चय ही ये हमारे महत्वपूर्ण लेखक हैं, लेकिन हिन्दी के और भी लेखक इस भीड़ भाड़ में शामिल कर लिए जाते, तो कम से कम हिन्दी का मान तो बढ़ता, लेकिन जब साहित्य उत्सव बन जाता है, तो ऐसी भूलें हर साल ही दोहराई जाती हैं। दुरभाग्य तो यह है कि मरुस्थल की ये आवाजें राजनीति के पिछवाडे़ में डाल दी गई हैं। मुंशी प्रेमचंद ने साहित्य को राजनीति के आगे चलने वाली मशाल कहा था, लेकिन भूमंडलीकरण के दौर में राजनीति और कॉरपोरेट पूंजी आगे चलती है तथा साहित्य संस्कृति को कुछ लोग मिलकर इनके पीछे जोतने में लगे हैं। यह साहित्य का दुरभाग्य है और हम इसके गवाह हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-1356318562738694875?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/1356318562738694875/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=1356318562738694875' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/1356318562738694875'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/1356318562738694875'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2008/01/blog-post_22.html' title='साहित्यकारों का मेला गुलाबी नगर में'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-4403917229771411339</id><published>2008-01-17T10:53:00.000-08:00</published><updated>2008-01-17T11:08:23.844-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्मरण'/><title type='text'>रांगेय राघव को सादर श्रद्धांजलि</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_vLBK8uS08-I/R4-nkr-Y_yI/AAAAAAAAAEI/zF7pJcyjXlU/s1600-h/rangeya1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_vLBK8uS08-I/R4-nkr-Y_yI/AAAAAAAAAEI/zF7pJcyjXlU/s320/rangeya1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5156524347084046114" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;गुरुवार को प्रसिद्ध साहित्यकार रांगेय राघव की जयंती थी। विरले ही ऐसे सपूत हुए हैं जिन्होंने विधाता की ओर से कम उम्र मिलने के बावजूद इस विश्व को इतना कुछ अवदान दे दिया कि आज भी अच्छे-अच्छे लिक्खार दांतों तले अंगुलियां दबाने को विवश हो जाते हैं। जी हां, यह महान विभूति थे पंडित टी.एन. वीर रंगाचार्य के परिवार में 17 जनवरी, 1923 को जन्मे अजस्र प्रतिभा के धनी रांगेय राघव। उपन्यास, कहानी, कविता, आलोचना, नाटक, रिपोर्ताज, इतिहास-संस्कृति तथा समाजशास्त्र, मानवशास्त्र और अनुवाद, चित्रकारी, ...यूं कहें कि सभी विधाओं पर उनकी लेखनी बेबाक चलती रही औऱ उससे जो निःसृत हुआ, उससे साहित्यप्रेमी आज भी आनंदित होते हैं, प्रेरणा लेते हैं। 12 सितम्बर 1962 को उनका शरीर पंततत्व में विलीन हो गया, लेकिन उनका यश आज भी विद्यमान है। ३९ वषॅ की अल्पायु में डेढ़ सौ से अधिक कृतियां भेंट कर निस्संदेह उन्होंने सृजन जगत को आश्चर्यचकित कर दिया। बंगाल के अकाल की विभीषिका पर रिपोर्ताज `तूफानों के बीच´ में उन्होंने जो कीर्तिमान स्थापित किया, वह आज भी अविस्मरणीय है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी कुछ प्रतिनिधि कृतियां ये हैं---&lt;br /&gt;कब तक पुकारूँ,  धरती मेरा घर, पथ का पाप, प्रोफेसर, रत्ना की बात, लखिमा की आँखें, लोई का ताना,  मेरी भव बाधा हरो,  भारती का सपूत, देवकी का बेटा, यशोधरा जीत गई, घरौंदा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी प्रत्येक कृति बेजोड़ है, पर &lt;a href="http://www.abhivyakti-hindi.org/gauravgatha/2001/gadal/gadal1.htm"&gt;गदल कहानी सबमें विशिष्ट स्थान रखती है। &lt;/a&gt;इसमें भारतीय नारी के स्वाभिमान व जुझारू व्यक्तित्व का बड़ा ही सजीव चित्रण किया गया है। आप भी लीजिए इस कथा का आनंद।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-4403917229771411339?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/4403917229771411339/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=4403917229771411339' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/4403917229771411339'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/4403917229771411339'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2008/01/blog-post_17.html' title='रांगेय राघव को सादर श्रद्धांजलि'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp3.blogger.com/_vLBK8uS08-I/R4-nkr-Y_yI/AAAAAAAAAEI/zF7pJcyjXlU/s72-c/rangeya1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-8770215605890695615</id><published>2008-01-13T12:11:00.000-08:00</published><updated>2008-01-13T12:17:27.100-08:00</updated><title type='text'>प्रज्ञाचक्षुओं ने बहाई काव्य सरिता</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_vLBK8uS08-I/R4pxwb-Y_tI/AAAAAAAAADg/6IrxDtkKYtQ/s1600-h/kavi.gif"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_vLBK8uS08-I/R4pxwb-Y_tI/AAAAAAAAADg/6IrxDtkKYtQ/s320/kavi.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5155057800436055762" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हर शहर की अपनी फितरत होती है, गुलाबी नगर की भी है। मकर संक्रांति यूं तो पूरे देश में मनाई जाती है, लेकिन जयपुर में इन दिनों  पतंगबाजी का सुरूर सा छाया रहता है। पूरा आसमान पतंगों से अट जाता है। मकर संक्रांति के दिन घरों में रहता है सन्नाटा और छतें हो जाती हैं आबाद। डीजे की धुनों के बीच दिनभर बच्चे-युवा और यहां तक कि बुजुगॅ भी पेंच लड़ाने में व्यस्त रहते हैं। नाश्ता-भोजन भी छतों पर ही पहुंचा दिया जाता है, बीच-बीच में चाय-कॉफी के दौर भी चलते रहते हैं। &lt;br /&gt;हां, तो मैं तो कुछ और कहना चाहता था लेकिन अपनी आदत से लाचार लीक से भटक गया। तो मैं बता रहा था कि मकर संक्रांति के उल्लास के बीच ही जयपुर के प्रज्ञाचक्षु कवि नरेंद्र कुमार शरमा-कवि-ने १२ जनवरी शनिवार की शाम जवाहर कला केंद्र के रंगायन सभागार में अंतरराष्ट्रीय दृष्टिहीन एवं विकलांग कल्याण संस्थान जयपुर के बैनर तले अखिल भारतीय हास्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया। इसमें काव्यपाठ करने वाले सभी कवि प्रज्ञाचक्षु ही थे। इन्हें सुनने के बाद यह ऐलान तो किया ही जा सकता है कि इन्हें नेत्रहीन तो नहीं ही कहना चाहिए, दृष्टिहीन भी नहीं कहा जाना चाहिए। जीवन के प्रति इनकी दृष्टि जिसे हम विजन भी कहते हैं, हम आंख वालों से बढ़कर ही हैं।  &lt;br /&gt;तो आप भी लीजिए कुछ कविताओं का आनंद -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूरज लहू-लुहान समंदर में गिर पड़ा,&lt;br /&gt;दिन का गुरूर खत्म हुआ शाम हो गई।&lt;br /&gt;के साथ उत्तर प्रदेश के सीतापुर से आए मनोज वाजपेयी ने अपने तेवर स्पष्ट कर दिए थे। &lt;br /&gt;प्रस्तुत है उनकी यह कविता---&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तन्हाइयों को दूर हटाने की बात कर,&lt;br /&gt;मिलने की बात कर तू मिलाने की बात कर।&lt;br /&gt;वादे हजार कसमें बेशुमार यूं न खा,&lt;br /&gt;दो-चार कदम साथ निभाने की बात कर।&lt;br /&gt;जन्नत के ख्वाब छोड़ दे परियों की कहानी, &lt;br /&gt;आ बैठ मेरे पास ठिकाने की बात कर।&lt;br /&gt;दुनिया बना रही है चांद-तारों का महल,&lt;br /&gt;तू सिफॅ इस धरा को सजाने की बात कर।&lt;br /&gt;गुजरी तमाम उम्र ये पूजा-नमाज में, &lt;br /&gt;अब दो दिलों के फकॅ मिटाने की बात कर।&lt;br /&gt;दुनिया सुलग रही है नफरतों की आग में,&lt;br /&gt;तू प्यार की सौगात लुटाने की बात कर। &lt;br /&gt;जख्मी है कदम ठोकरों की सख्त मार से, &lt;br /&gt;इस हाल में न हाथ छुड़ाने की बात कर।&lt;br /&gt;जिनके दिलों में प्यार है बातों में रंज है,&lt;br /&gt;उनको मनोज मन से मनाने की बात कर।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनोज वाजपेयी ने कुछ यूं स्वर बदले-----&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल में अजीब ददॅ जलाकर चला गया,&lt;br /&gt;तूफानी जलजला कोई आकर चला गया। &lt;br /&gt;खंजर थमाए पेट की रोटी को छीनकर,&lt;br /&gt;भूखों पर सेमिनार कराकर चला गया।&lt;br /&gt;मैंने दीये जलाये उसकी आवभगत में, &lt;br /&gt;वो मेरे घर को आग लगाकर चला गया।&lt;br /&gt;ये भी महज मनोज एक इत्तेफाक है&lt;br /&gt;कि मेरी गजल इनाम वो पाकर चला गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्होंने हर छोटे-बड़े मसलों पर --जाने दो---की हमारी सहज प्रवृत्ति पर कुछ यूं चुटकी ली---&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब जुमॅ की ललकार पर इंसाफ बिल्कुल मौन है,&lt;br /&gt;चुप तुम नहीं, चुप हम नहीं तो तीसरा फिर कौन है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समाज में तथाकथित शक्ति-वैभव संपन्न तबके को मनोज ने यूं आईना दिखाया--&lt;br /&gt;तूफान किसी को क्या देगा, मैं मंद पवन सारी दुनिया के जीवन का आधार बनी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-मुझे अनुग्रह नहीं चाहिए मुझे नहीं अभिलाषा वर की-&lt;br /&gt;के साथ कोटा से आए राजेश गौतम ने कुछ यूं फरमाया---&lt;br /&gt;जिसमें दुख ही दुख होता है वो मुस्काना बाकी है, &lt;br /&gt;सब कुछ खो देने की हद तक तुझको पाना बाकी है।&lt;br /&gt;धान पड़ी है चिड़िया भूखी, फिर भी इक तिनके की चाहत, &lt;br /&gt;मां होने की तकलीफों का बोझ उठाना बाकी है।&lt;br /&gt;रहिमन वाले धागे वाली गांठ ने हमने टूटने दी,&lt;br /&gt;पर कबिरा के चादर वाली ताना-बाना बाकी है।&lt;br /&gt;----------------------------------&lt;br /&gt;लाख इंसान चाहे तो क्या है, वक्त पर जोर चलता नहीं है,&lt;br /&gt;साथ देती है दुनिया भी जब तक, कोई मतलब निकलता नहीं है। &lt;br /&gt;-------------------------------&lt;br /&gt;दो घड़ी और बतियाने दो, ज्योति अपनी फैलाने दो&lt;br /&gt;सूरज थोड़ा और ठहर जा, सांझ अभी न ढलने दो &lt;br /&gt;के संदेश के साथ बाड़मेर से आए विष्णु खंडेलवाल ने माता-पिता के प्रति हमारे कतॅव्य का अहसास कराया---&lt;br /&gt;जग में यदि कुछ भूल भी जाओ तो भूल नहीं है पाप,&lt;br /&gt;पर मां-बाप को भूल न जाना, यह भूल नहीं है माफ।&lt;br /&gt;पिता देव माता को देवी जग में जिसने जाना,&lt;br /&gt;तन-मन से सेवा कर उनकी वह अमर हुआ जग जाना।&lt;br /&gt;दौलत से क्या नहीं मिलता है नहीं मिलता सब संसार,&lt;br /&gt;पर मां-बाप नहीं मिलते हैं न मिलता वैसा प्यार।&lt;br /&gt;जीते जी नित इनकी सेवा कर लें हम और आप,&lt;br /&gt;पर मां-बाप को भूल न जाना यह भूल नहीं है माफ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रतापगढ़ के राजेश जोशी ने अपनी भावनाएं हमसे यूं शेयर की---&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर गम से हो आगाह जरूरी तो नहीं है,&lt;br /&gt;हर राही हो गुमराह जरूरी तो नहीं है। &lt;br /&gt;संतोष कुमार ने अपनी चाहत यूं बयां की---&lt;br /&gt;हमको पूरी धरा ना कोई गगन चाहिए, &lt;br /&gt;अप्सरा न कोई गुलबदन चाहिए। &lt;br /&gt;इसके बाद उन्होंने---हे राम अयोध्या मत आना---के माध्यम से वतॅमान परिवेश में व्याप्त विसंगतियों पर तीखा कटाक्ष किया।&lt;br /&gt;जयपुर के प्रिंस बड़जात्या ने-&lt;br /&gt;नन्हीं किरण की पुकार, मुझ नन्हीं किरण को आने दो,&lt;br /&gt;ज्योति अपनी तुम फैलाने दो&lt;br /&gt;से अपनी उपस्थिति दरशाई। &lt;br /&gt;इनके अलावा तालेश्वर मधुकर, खेमकरण कश्यप, रामखिलाड़ी स्वदेशी, मनमोहन तिवाड़ी, उदयपाल सिंह,  शुभांगी पांडे, बाबूलाल सरोज, महेश, रामावतार शरमा, कुसुमलता ने भी अपनी कविताओं से काव्यरसिक श्रोताओं को झुमा दिया। एक-एक मुक्तक पर तालियों से श्रोताओं से खचाखच भरा सभागार गूंज रहा था। राजस्थान के समाज कल्याण मंत्री मदन दिलावर पूरे समय मंच पर बैठे रहे और शिद्दत के साथ न केवल कविताएं सुनाईं बल्कि उनकी हौसला आफजाई भी की। जयपुर के सांसद गिरधारीलाल भागॅव के साथ नगर के गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति से कायॅक्रम अपने शबाब पर था। इस सफल कवि सम्मेलन का बहुत ही अच्छा संचालन जयपुर की कवयित्री और शायर शोभा चंदर ने किया। मैं भरसक प्रयास करूंगा कि इस कवि सम्मेलन की और कुछ श्रेष्ठ कविताएं आपके सामने प्रस्तुत करूं क्योंकि ऐसे प्रतिभावान कवि कम ही मिलते हैं और ऐसे आयोजन तो मुश्किल से ही हो पाते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-8770215605890695615?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/8770215605890695615/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=8770215605890695615' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/8770215605890695615'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/8770215605890695615'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2008/01/blog-post_13.html' title='प्रज्ञाचक्षुओं ने बहाई काव्य सरिता'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp1.blogger.com/_vLBK8uS08-I/R4pxwb-Y_tI/AAAAAAAAADg/6IrxDtkKYtQ/s72-c/kavi.gif' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-7014086685174810731</id><published>2008-01-08T12:29:00.000-08:00</published><updated>2008-01-08T12:31:08.846-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्‍वागत'/><title type='text'>नये वषॅ के स्वागत में गीत गुनगुनाइए</title><content type='html'>नवागत नववषॅ 2008 का एक सप्ताह बीत चुका है, नववषॅ की बधाई के एसएमएस और फोन आने का सिलसिला तो थम गया है, पर गाहे-बेगाहे ग्रीटिंग काडॅ और इक्के-दुक्के पत्रों का आना अभी भी जारी है। इस माह आ रही पत्रिकाएं भी नववषॅ के स्वागत में कविता पाठ कर रही हैं, गीत गुनगुना रही हैं। ऐसा लगता है कि हमारे चहुंओर विराज रही प्रकृति भी नववषॅ के इस उत्सव में हमारे साथ है। तो आइए, हम भी नववषॅ के स्वागत में लिखा गया दिनेश शुक्ल का यह गीत गुनगुनाएं -&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;स्वागत में नववषॅ के &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मेहंदी रची हथेलियां, लिए रंगोली थाल, &lt;br /&gt;नये वषॅ की सुबह यह, दीप रही है बाल.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केले के पत्ते हरे, चावल, शहद, गुलाब,&lt;br /&gt;स्वागत में नववषॅ के हवा लिखे शुभ-लाभ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाती गीत सुहागनें, खनके बाजू-बंद,&lt;br /&gt;घर-आंगन में गूंजते, नये वषॅ के छंद.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौसम चितवे धूप को, देखे रूप, अनूप, &lt;br /&gt;रह-रह कर हंसती सुघड़, नये वषॅ की धूप.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झिलमिल-झिलमिल रोशनी, मोती वाली सीप, &lt;br /&gt;तुलसी के बिरवे तले, जले वषॅ के दीप.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बैठ नदी के घाट पर, धूप धो रही पांव, &lt;br /&gt;भौंचक होकर देखती, नये वषॅ की छांव.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नये वषॅ, बोली हवा, झुक, इमली के कान,&lt;br /&gt;पगडंडी पर कर गया, जादू रात सिवान.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महानगर, कस्बे, शहर, जंगल, गांव, सिवान, &lt;br /&gt;सबके होंठों पर रचे, नया वषॅ मुस्कान.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ कोशिश, कुछ हौंसले, कुछ उम्मीदें संग,&lt;br /&gt;नये वषॅ के द्वार पर, बिखरे कितने रंग.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इच्छाएं, शुभ-लाभ यह, सुख-दुख, चिंता-हषॅ, &lt;br /&gt;सुख सपनों के जोड़ता, गणित खड़ा नव वषॅ।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;em&gt;( साभारः नवनीत, जनवरी 2008)&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-7014086685174810731?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/7014086685174810731/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=7014086685174810731' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/7014086685174810731'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/7014086685174810731'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2008/01/blog-post_08.html' title='नये वषॅ के स्वागत में गीत गुनगुनाइए'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-4713265819698037824</id><published>2008-01-06T00:11:00.000-08:00</published><updated>2008-01-06T12:00:00.682-08:00</updated><title type='text'>इसलिए-खेत-ने मार लिया मैदान</title><content type='html'>इसलिए-खेत-ने मार लिया मैदान&lt;br /&gt;किन कारणों से किसान को धरतीपुत्र कहा जाता है। माटी से मोह किसे कहते हैं। धरती छिनने पर नंदीग्राम में संग्राम के बीज कहां छिपे होते हैं, सब कुछ छूट जाने के बाद भी आदमी अपना ठीया-ठौर क्यों नहीं छोड़ना चाहता है, सवॅसंपन्न बेटे-बहू के साथ रहने की बजाय एक वृद्ध अपने अंतिम दिन अपने गांव में सारी परेशानियों को अकेले भोगना ही क्यों श्रेयस्कर समझता है। गोस्वामी तुलसीदास की चौपाई ०जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई० को चरिताथॅ करता हुआ संपन्न आदमी और पाने की चाहत में किस तरह विपन्नों से भी विपन्न कैसे बन जाता है, ऐसे बहुत सारे अनुत्तरित प्रश्नों के समाधान खोजने की भरपूर कोशिश की गई है,  रत्न कुमार सांभरिया की इस कहानी -खेत-में। छोटे-छोटे वाक्यों में कहानी इस कुशलता से बुनी गई है कि कहना ही क्या। मैं अबोध तो भला कैसे सुना सकता हूं इस पुरस्कृत कहानी की रामकहानी, आप प्रबुद्ध हैं, खुद ही पढ़कर देख लीजिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खेत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बूढ़ा के लिए खेत था। सोलह आना सच यह था कि वह दो सौ वगॅ गज का प्लॉट था, उसके पचीस-पचीस फीट के आठ क्यार बने हुए थे। क्यार-क्यार न्यारी फसल उगी थी। चना, जौ, गेहूं, गाजर, पालक, धनिया, मेथी। आठवें क्यार में बूढ़ा की झोपड़ी थी। प्लॉट के तीनों ओर बिल्डिंगें बनी हुई थीं। सामने तीस फीट की सड़क थी। हवा पानी दोनों इसी राह आते थे, बूढ़ा के लिए। गेट के नाम पर बबूल की छाजन का फाटक था। आड़, चाहे बाड़ हो। &lt;br /&gt;प्लॉट के लिए आए दिन खरीददार आते। बढ़-चढ़कर मोल-भाव करते। बूढ़ा से जिदयाते-बाबा, अकेले जीव हो। बावली बात छोड़ो। दाम बोलो। दाम पकड़ो। बूढ़ा खुद्दार। बूढ़ा जज्बाती। बूढ़ा खानदानी। बेलाग कहता-शरीर का सौदा साई, होवे छै कांई। बूढ़ा ७४ वषॅ की अपनी अवस्था को गिनता गामता तक न था। वह अपने क्यारों में निराई करता। खोदी करता। पानी बलाता। खुद अपनी रोटी-पानी करता। रात हुई। झोपड़ी में बिछी खाट पर लेट जाता। रात गहराने लगती। बूढ़ा अतीत की स्मृतियों में गुम होने लगता। अतीत और आज, दो ध्रुवों की तरह थे। आकाश, चांद-सितारों को नापता बूढ़ा अपनी झोल खाट पर गोल हुआ सो जाता, आसमान में परवाज भरने वाला पंछी अपने घोंसले में पंख समेट कर बैठता है। &lt;br /&gt;एक दिन बूढ़ा उठा। शरीर अकड़ा था। बूढ़ा को बुखार जकड़ा था। लाइन के दूसरी ओर बूढ़ा की दादालाई थी। वहां खबर कराई गई। बूढ़ा के कुटुंब के लोग। बूढ़ा की सेवा-सुश्रूषा की। दवा-दारू हुई। बूढ़ा को सीख दी गई-&lt;br /&gt;०बाबा, बीमारी बुढ़ापा की बैरन होती है। सांस रोकती है। सांस ही शरीर की गाड़ी है। सांस थमी, देह माटी हुई। तुम्हारे बेटे को फोन कर देते हैं, साथ चले जाना उसके।० &lt;br /&gt;बूढ़ा कोहनी तक हाथ जोड़, मुआफी सी मांगते ना कह देता। बूढ़ा और बालक की चाम नाजुक होवे छै। हवा, पानी जल्दी लाग जावै। कभी साज, कभी नासाज। किसट तो माकी काया भोगेली। &lt;br /&gt;एक हवा उड़ी। हवा गली-गली दस्तक देती गई कि बूढ़ा का जी उठ खड़ा हुआ है। वह प्लॉट बेचकर अपने बेटे के पास जाएगा। देखें, किसके जोग हैं। हवा में रंगत आ गई। बीमार बूढ़ा के पास आने वालों का तांता लगा रहता। मरणासन्न कीट को कीरियां घेर लेती हैं। जिनका कोसों खोज नहीं था, वे तन के लत्ते से बूढ़ा के करीबी हो गए थे। खैरियत जानना जरिया रहा, साध बूढ़ा का खेत थी। बगुला इधर-उधर गदॅन घुमाए, टकटकी मछली पर होती है। दवा का असर होता गया। बूढ़ा बीमारी से उबरता गया। बूढ़ा ने बड़ों का सुना-गुणा। खाट पर अच्छा भला बीमार हो जाता है। डोलते-फिरते से पांव मोकले होते हैं। देह खुलती है। &lt;br /&gt;उसने चादर की बुक्कल मारी। साफा बांधा। जूतियां पहनीं। बूढ़ा ने लाठी नहीं पकड़ी थी, अभी। लाठी निकाल ली थी, झोंपड़ी से। शरीर कांपता-हांफता है। सरसरी है। माथा घूमता है। लाठी सहारा देगी। बूढ़ा ने फाटक भिड़ाया और सड़क पर उतर गया था। भारी-भरकम सा एक हाथ बूढ़ा के कंधे पर गिरा। बूढ़ा चौंका। बूढ़ा ठिठका। छोहभरा बूढ़ा पीछे मुड़ा। चौथी गलती में रहने वाला पंजाबी था। उसकी वय पचपन से टपी न होगी। सिर, भौंहें और हाथ-पैर पर सफेदी उतर आई थी। बूढ़ा ने मूंछों ढंके होंठ बुदबुदाए कि वह खुद बोल पड़ा था-०बुड्ढे बाबा पवनदास पंजाबी हां असी। चौथी गली विच रहंदे हां, उत्थो ही दुकान हन, साढ़ी।० &lt;br /&gt;चप्पा-चप्पा बूढ़ा के पांव चस्पा था। किशोर केरसिंह, आज जग की जुबान०बूढा०है। वह और उसके जोड़ीदार कबड्डी खेला करते थे, वहां। &lt;br /&gt;०बोल कांई छै? ० बूढ़ा के कंठ तुरशी थी। &lt;br /&gt;०प्लॉट दा कि मांगदे हां, तुसी?०&lt;br /&gt;०घर का गूदड़ा।० &lt;br /&gt;०हूं, दसो-दसो।०&lt;br /&gt;बीमारी में क्रोध, बारूद में तीली। बूढ़ा ने संयम बरता-०कह दी ना ना बेचूं।० बूढ़ा की ना में दुत्कार भी थी, फटकार भी थी। बूढ़ा का जी आगे तक टहल कर लौटने का था। कॉलोनी में कहां क्या नया हुआ है, देखने की उसकी जिज्ञासा थी। वह अपनी खाट पर आ लेटा था। मुट्ठी में दबी रेत का कण-कण निकालता है। खूड़-खूड़ हाथ से निकल जाने की व्यथा बूढ़े को मथने लगी। बूढ़ा की खतौनी आठ खेत थे। सौ बीघा जमीन थी, पक्की। तीन बरस अकाल पड़ा। बीस बीघा जमीन बेच दी, चारे के मोल। खुद खाया। पशुओं को खिलाया। बेटे की कोचिंग। बेटे का लगातार बाहर जाकर पढ़ना, बेटे का यादगार ब्याह। पत्नी का झेरे में गिरकर मरना। पुलिस का बाज बन जाना। पत्नी का मौसर। अड़ी हुई, जमीन निकाल दी, मानो जमीन नहीं, गुल्लक के पैसे हों। &lt;br /&gt;अंतरवेदना लहरों सी हिलोरों सी उठती। बूढ़ा खुद को सांत्वना देता। अपने पूवॅजों को मानों ढांढ़स बंधाता-०सब कुछ बेचकर भी कुछ गंवाया नहीं है मैंने। अपने पास जो टुकड़ा है, उसका रोकड़ा, उस सगली जमीन से घना है, आज०। बूढ़ा आकाश में खिले तारों की तरह खिलखिलाता, उसके खेतों पर शहर बस रहा है। &lt;br /&gt;एक घटना ने उसे उद्वेलित किया। एक खेत बंजर पड़ा था। झांड़-झंखाड़ उगा था। कीकर, बबूल खड़ी थी। लोमड़, सियार, भेड़िया जैसे डरावने जानवर खोंखियाया हुंकियाया करते थे। आज एक बड़ा स्कूल खड़ा हो गया है वहां। सेठ, साहकार, रईसों, शहजादों के बालक मोटर में बैठकर पढ़ने आते हैं, दूर-दूर से। स्कूल टकटकाता बूढ़ा अवचेतन में चला गया था। वह भीतर जाकर उस खोह को देखना चाहता था, जहां भेड़िए के मुंह पर लाठी मारकर उसने लहूलुहान बकरी को छुड़ाया था। जुनूनी बूढ़ा आगे बढ़ा। गेट पर बैठी चपड़ासन ने डंडा ठठकार दिया था-०ताऊ किस जागा? छोरा-छोरी पढ़ै से के थारा इस स्कूल में?० &lt;br /&gt;बूढ़ा का अंतस तनतनाया-०कह दूं। मुंह को लगाम दे बाई। किसका खेत है, बैठी चाकरी करती है तू०। बूढ़ा का मन कभी उन खेतों में, तो कभी उन पर उगे कंकरीट के जंगल में विचरण कर रहा था कि प्लास्टिक के पाइप से पानी कूदने लगा था, गल्ल। फुरॅ फुरॅ। गल्ल गल्ल। हवा और पानी भरा पाइप कुचले सांप की तरह छटपटा रहा था। &lt;br /&gt;तबियत बहाल होते ही बाल का मन खेल खिलौनों में लग जाता है, बूढ़ा अपने क्यार में जा खड़ा हुआ था। कुरते की बांह संगवाए था, कुहनी तक। धोती के खूंट अडूंसे थे, घुटनों तक। रूमाल उतारकर एक ओर रखा था। हाथ में खुरपी थी। नंगे पैर थे, सिंचते खेत जूती चप्पलें नहीं चलतीं। &lt;br /&gt;०बाबा। बूढ़ा बाबा। बाबा साहब। ओ बाबा। ०&lt;br /&gt;बूढ़ा के उम्र पके कान ऊंचा सुनते थे। बीमारी के बाद और क्षीण हो गए थे। बूढ़ा के भोथरा कानों से शब्द टकराए। उसने खुरपी वाले हाथ को जमीन में रोप सा दिया था, जैसे। दूसरा हाथ गोड़े पर रखा और उठ खड़ा हुआ। बूढ़ा बैल थान से उठा हो, थूथन जमीन पर टिका कर देखा। चश्मे के भीतर आंखें छपछपाईं। सधाईं। बूढ़ा को गुस्सा आया। उसकी खाट पर आ बैठा कौन बेशऊर है। उसने चश्मे की दोनों डंडी कानों पर ठीक की। निगाह बांधी। खाट पर बैठे शख्स को पहचान लिया था। वही वकील जी, जो बूढ़ा की बीमारी के टेम आए थे, बूढ़ा की खाट पर बैठकर उसका बुखार देखा था। आत्मीयता से बतियाते थे। बाप का नाम जाना था। खेत की नाप पूछी थी। वकील ने बूढ़ा की ओर देखा। उसके गीले पैर जमीन छपते आए थे। खुरपी वाले हाथ से रेत मिट्टी टपक रहे ते। उन्होंने बूढ़ा को नमस्कार कर पूछा-०बाबा अब तबियत कैसी है, आपकी? ० हिदायत दी-०पानी में मत रहो, आराम करो।० &lt;br /&gt;झबरीली मूंछों के भीतर बूढ़ा मुसकराया-०जीते जी आराम कांई वकील जी०। बूढ़ा के नेत्रों में विभोर उतर आया था। बूढ़ा यानी केरसिंह मोटियार था। भौंरे के रंग जैसी स्याह मूंछों के ताव चढ़े छोर बैलों के सींगों की तरह आसमान देखा करते, उमरदराज भैंसे के माथे पर लुढ़के सींगों की भांति उसकी धोली मूंछें ठोढ़ी पर पड़ी थी। बूढ़ा का गीली मिट्टी और पानी भरा हाथ मूंछों पर आ बैठी मक्खी को उड़ाने लगा था। गंदलाई एक बूंद मूंछों के बालों से रिपसती छोर पर थिर गई थी। वकील हंसे। &lt;br /&gt;उन्होंने बूढ़ा को विश्वास में लिया-०बाबा साहब, साठ फीट के रोड पर जो ट्रांसफामॅर है ना, उसके दो प्लॉट आगे इमली का पेड़ है एक, उसी से दूसरा प्लॉट है, मेरा। ०&lt;br /&gt;०दूसरो या तीसरो?०&lt;br /&gt;०तीसरा नहीं दूसरा बाबा। ०&lt;br /&gt;०जको आगे अबार बनो छौ, अब बुच लाग्योड़ी छै?० &lt;br /&gt;०तांत्रिक हो बाबा।०&lt;br /&gt;बूढ़ा बोला-०वकील जी वैंडे हमने अपनो बैल दबायो छो, बीस बोरी नमक मेल। ०&lt;br /&gt;बूढ़ा के कंपकंपाते होंठों के साथ मूंछें भी कांप गई थीं। वकील का, जी सा निकल गया था। मुंह खुला का खुला रह गया था, बया-सा। अंडरग्राउंड खोदते पशु कंकाल की बात अंदर रख ली थी। कहता, वह पेड़ उसने अपने हाथों लगाया था, ऐन आजादी के दिन। वहां झाड़ियां थीं। बोर थे। बुरट थे। निकलो, कपड़ों पर चिपक जाते थे, बुरी तरह। खेत की डोल-डोल निकलते थे। &lt;br /&gt;बुढ़ा को गुमदाया देख, वकील ने यकीन दिलाया-०बाबा साहब, वह आदमी आला काला नहीं है। मैं बीच में हूं ही। चिंता मत करो।०&lt;br /&gt;अधॅ बधिर बूढ़ा हुं, हां कर अपने क्यारों की ओर बढ़ गया था, नल चला जाएगा। वकील का स्कूटर फाटक के बाहर बस्ता बांधे खड़ा था। एक गाय मुंह उठाती फाइलों की ओर बढ़ गई थी। उधर दौड़ते वकील ने बूढ़ा की ओर हाथ हिलाया। जवाब में बूढ़ा ने भी हाथ हिला दिया था। वकील गदगद हुए-०बाखड़ भैंस देर से पोसाती है, बूढ़ी अकल विलंब से बावड़ी।०बूढ़ा बीमार हुआ, उस दिन से साग-सब्जी बेचने नहीं गया था। पालक, मेथी, चना का साग बड़ा हो रहा था, क्यारों में। बूढ़ा ने तोड़ चूंट सागपात का मिला, कर लिया था, पोटली भर। बूढ़ा सौ फीट सड़क के जिस नुक्कड़ पर सब्जी लेकर बैठा करता, वह बरकत की ठौर थी, जैसे। यहां सब्जी की पोटली उतारते ही उसके जेहन में पानी भरे बादलों की भांति कुछ घुमड़ता। कभी दो कुओं की सब्जी, भेली होती थी, यहां। बैलगाड़ी सब्जी मंडी नहीं जाती थी। चिल्ल-पों, भीड़-भड़ाका, बैल चमकते चौंकते थे। तांगा ले जाया करते थे। &lt;br /&gt;एक जना बूढ़ा के सामने आ खड़ा हुआ था। बूढ़ा ने पोटली खोलकर साग में हाथ मारा-०आओ बाबू साहब ताजा साग छै, अपना खेत को। चार रुपए पाव देऊंलो।० लंबे-तगड़े बदने पर ढीला-ढंकल सा कुरता-पाजामा पहने पैंतीस साल के उस आदमी की पुतलियों में कुछ और ही दिपदिपा रहा था। हल्की सी खंखारी ली-०बूढ़ा बाबा, अपना प्लॉट का भाव बताओ थै, तो०। बोनी बट्टा हुआ नहीं कि....। बूढ़ा धधका। बूढ़ा चमका। बूढ़ा ने होंठ से जीभ काटी-०साग की बात कर बाबू, पिलाट विलाट ना बेचूं, मैं।० &lt;br /&gt;बूढ़ा एक ग्राहक को साग तौल रहा था। उचंती सा एक दलाल आया। बैठा। उसने आव देखा न ताव, बैग की चेन खींची-सौ-सौ के नोटों की तीन गड्डियां बूढ़ा के साग पर बिछा दी थीं। पूरे तीस हजार थे। उसकी सूझ थी, प्लॉट या मकान बेचने वाले के सामने रकम बिछा दो। नोटों की गरमी से जमे घी की तरह पिघल जाएगा वह। गरूर से कहने लगा-०बूढ़ा बाबा, पाव-पाव कांई बेचो। पिलाट का दाम बोलो। रोकड़ा लो।० बूढ़ा की नस-नस में ज्वाला उतरी थी। रोआं-रोआं उठ खड़ा हुआ था। मूंछों के बाल हुंचकने लगे थे। बूढ़ा को लगा जैसे किसी ने उसके भीतरले (हृदय) को खूनमखून कर दिया है, सरे राह। चीते में भी इतनी चपलता ना हो। कट्टे में पड़ा चाकू निकालकर बूढ़ा झट खड़ा हो गया था। उसने दलाल के सीने पर चाकू रख दिया था-०बोल, थारा कालजा को कांई लाग्यो।० &lt;br /&gt;सिंह शावक सा कुलांचे भरता दलाल का उत्साह, चूहे जैसे भय में परिणत हो गया था। उसकी आंकें बाहर निकल आई थीं। गिरीं, अब गिरीं। चेहरा फक्क पड़ गया था। दलाल अपने पैसे समेट कर भीगी बिल्ली सा चला गया था। झुंझल बूढ़ा की झुररियों में झूलती थी। तमाशबीन दांतों तले अंगुली दबाए ते, बूढ़ा कि शोला। बूढ़ा का मन उचट गया था। हृदय चोट खाई गेंद की नाईं उछल-बैठ रहा था। काला रंग का एक सांड खड़ा हुआ था। बुढ़ऊ पर, जिजीविषा लिए। बूढ़ा उठा और उसके सामने साग की धोती झड़का दी थी। &lt;br /&gt;सड़क के दोनों किनारे मंजिल पर मंजिल बनती जाती थी। दुकानें और शॉपिंग सेंटर खुले थे। बूढ़ा अपना धोती कट्टा लिए उन्हें अपलक निहारता चला जाता था। आह भरता, उसी के खेत में है। &lt;br /&gt;मोड़ था। एक महिला बूढ़ा के सामने घिर गई थी। &lt;br /&gt;नाराजगी भरे अंदाज में वह बूढ़ा से बोली-०बाबा, म्हारा पिसां कांकरा था कांई। ० दूसरां ने प्लॉट बेच दियो।०&lt;br /&gt;बूढ़ा छोह से बिगड़ा-०कै ससुरा ने बेच दियो पिलाट? कै साला ने खरीद लियो, बता तो।०&lt;br /&gt;०मरद मरण नै मर जाएगा, मन की थाह ना देगो।० &lt;br /&gt;वह साड़ी का पल्लू सिर पर लेती, फुच्च फुच्च थूक फुचकती आगे बढ़ गई थी। &lt;br /&gt;बूढ़ा अपने खेत से बाहर निकलताष ०खेत बिकाऊ नहीं है०, अपनी अनगढ़ लिखावट में कागज या गत्ते पर लिख उसे बंद फाटक पर टांक देता। लौटता, कागज या गत्ता नदारद मिलता। हवा ले जाती। गाय मुंह भर जाती। कचरा बीनने वाले झटक ले जाते। बूढ़भस को एक नई सूझी। उसने गेट पर तीन-चार तसला रेत डाल दिया था। बूढ़ा रेत को अपनी हथेली से एकसार करता। अंगुली से गहरी लकीर खींचता और -०खेत बिकाऊ नहीं है।०मांड देता, टेढ़ा-मेढ़ा। बूढ़ा वापस आता। उसका तन-बदन जल उठता। वह इबारत भांति-भांति के खोजों से रौंदी मिलती। &lt;br /&gt;बूढ़ा अपने खेत के सामने ठिठक गया था। कलेजा धक रह गया था। सांसें कपाल जा लगी थीं। फाटक खुला था। पुलिस की गाड़ी बाहर खड़ी थी। बड़े-बड़े खोज अंदर की ओर थे। खेत की नाप-जोख हो रही थी। डी.वाई.एस.पी. खुद फीता पकड़े थे। &lt;br /&gt;खातेदार बूढ़ा हो या बालक, उसमें मालिकाना अहम होता है। बूढ़ा ने बाट-तराजू का कट्टा नीचे पटका। धोती खाट पर फेंकी। बूढ़ा बंदर की फुरती लिए लपका और पुलिस अफसर के हाथ से फीता झटक लिया था-०मरां को माल छै कांई, फीतो डल रहो छै?० &lt;br /&gt;पुलिस अफसर खड़ा रह गया था, सट्ट। तैशभरी आंखें बताईं-०एडवांस नहीं लिया, तुमने।०&lt;br /&gt;०कै ससुरा ने लियो एडवांस? कै साला ने करो कागज पे गूंठो?० बूढ़ा ने उसांस छोड़ी।&lt;br /&gt;उन्होंने स्टांप पेपर की फोटो कॉपी निकाल कर पूछा-०तुम्हारा नाम केरसिंह सैन है?० &lt;br /&gt;०हुं।०&lt;br /&gt;०वल्द भगवानाराम।०&lt;br /&gt;०हुं।०&lt;br /&gt;०उम्र चौहत्तर वषॅ?०&lt;br /&gt;०हुं।०&lt;br /&gt;०साइज दो सौ वगॅ गज?०&lt;br /&gt;०हुं।०&lt;br /&gt;०हुं-हुं-हुं। बाबा साहब, बूढ़ों पर यकीन करना धमॅ मानते हैं। आप हैं कि पांच हजार एडवांस लेकर गिरगिट हो गए।०&lt;br /&gt;०कांई ससुरा ने पाई भी ली, खट्टाराम की सों।० सच्चाई बूढ़े की आंखों में नमी के रूप में उतरी थी। &lt;br /&gt;गेंद पानी में डुबाओ, उछल कर ऊपर आती है। पुलिस अफसर का क्षोभ दबाए नहीं दबता था। उनका मन हुआ था। टोकरे की खपच्चियों जैसी पसलियों के ढांचे इस डोकरे को गाड़ी में पटक कर ले जाए और भांग उगाने का केस बनाकर इसकी बुढ़ौती बिगाड़ दे। चवन्नी की चमक में चाकर का चेहरा या उसके उसके हुक्काम था। बूढ़ा के अफसर बेटे का ख्याल कर उन्होंने अपना फीता समेट लिया था। &lt;br /&gt;बूढ़ा ने अपनी नम आंखें पोंछीं। फाटक को बंद करते हुए अपने बेटे को दाद दी-०मेरो बेटो खट्टाराम बड़ो अफसर छै। फोन माले धरती धूजे। ना तो दो पैरां का जानवर मुनै मोस मीस कदी का खेत डकार जाता। ०&lt;br /&gt;पुलिस अफसर अपनी गाड़ी के पास आकर खड़े हो गए थे। वे वकील को बुलाकर बूढ़ा से रू-ब-रू होना चाहते थे, बयाना के बाद भी मुकर क्यों। दफ्तर से उनका मोबाइल आ गया था। चलो, बाद में बात करते हैं, कसाई का माल पाड़ा खाने से रहा। जग जवर कर रहा है बूढ़ा का सिर घूम रहा था। धोंकनी बढ़ गई ती। मोटियार केरसिंह कभी बीस फीट फौरा कूद जाता था, बूढ़ई डग-डग, झोंपड़ी तक पहुंचा। बल्ली पकड़ ली थी। शरीर में रीढ़ की हड्डी की तरह छान को रोके खड़ी शीशम की यह बल्ली बूढ़ा की हमउम्र थी। किसान अपने खेत खानाबदोश हो जाया करता है। जहां फसल उगाई, झोंपड़ी डाल ली। झोंपड़ी किसानों की निशानी। झोंपड़ी बूढ़ा का आशियाना। बल्ली हमसफर। बल्ली पर रखी छानें, शरीर से पुराने कपड़ों की तरह उतरती रहीं। बल्ली वही रही। &lt;br /&gt;सांस जुड़ी कि बूढ़ा खाट पर बैठ गया था। बिस्तर तले कागज जैसा कुरकुराया। बूढ़ा ने बिस्तर तहा कर देखा। हाथ लिखा दस रुपए का स्टाम्प था। नीचे दो दस्तखत थे। मजमून नोटरी पब्लिक से सत्यापित था। बूढ़ा को डंक सा लगा। कॉलोनी बूढ़ा को जिंदादिल कहती। बूढ़ा खुद को बड़ा हेकड़ मानता था। उसकी डरी-सहमी बूढ़ी आंकें कागज नहीं पढ़ पा रही थीं। बिम्ब बनता कि शब्द फिसल जाते, मानो शब्द नहीं पारा हो, न चुटकी में, न मुट्ठी में। &lt;br /&gt;विपदा की घड़ी, साहस संबल। चस्मा की डंडी पकड़े बूढ़ा कागज पर लिखा पढ़ गया था, शब्द-शब्द। राजफाश। उसका हाथ खाट पर रखी प्लास्टिक की थैली पर गया। कागज पर पांच हजार मंडे थे, वही थे। बूढ़ा को पसीना छूटा। &lt;br /&gt;आक्रोश, भत्सॅना और धिक्कार से बूढ़ा की गदॅन हिलती रही। ०डोकरा हूं न। अकेला हूं, न। दफन कर दो, बिन कफन।० वकील का लंबोतर चेहरा बाघ के मुंह सा भयानक और खाऊं लगा, बूढ़ा को। बीमारी के टेम, वकील ने उसके पेट में घुसकर बातें पूछी थीं। खेत में खड़े पुलिस अफसर ने तस्दीक कर दी थी। बूढ़ा की आंखों मेकं धरती-आसमान घूमने लगे थे। बूढ़ा झटके से उठा। उसने रुपए और कागज धोती-बंध में बांधे। साफा पहना। लाठी ली। लाठी पर बूढ़ा की मुट्ठियां कसती गई थीं। &lt;br /&gt;सांझ उतर रही थी। दीया-बाती का वक्त होने को था। आग का भभूका सा बूढ़ा०खेत ना बेचूं, खेत ना बेचूं० बरराता वकील के घर के सामने जाकर रुका। उसने घंटी के बटन पर अंगुली दबाई, घंटी नहीं, टेंटुआ हो। घंटी कुकड़ूं-कूं, कुकड़ूं-कूं, कुकड़ूं-कूं बोली। झबर बालों वाला एक कुत्ता लपक कर आया। वह बूढ़ा को भूंकता गेट नोंचने लगा था। बूढ़ा ने ठोरा मारा। कुत्ता डरकर दीवार के साथ जा लगा था। &lt;br /&gt;लुंगी बांधे कुरता गदॅ में डालते हुए वकील बाहर निकले। बूढ़ा को देख बाग-बाग हुए। वकील की अकल। अक्खड़ बूढ़ा खुद गेट पर है। &lt;br /&gt;वकील ने एक सुखद आह ली-०वकालत तो यूं ही टुच्च-टुच्च है। धंधा प्लॉटों की दलाली। दो थोक पचास हजार आएंगे।० &lt;br /&gt;गेट खोलते हुए वकील बूढ़ा से मुखातिब हुए-०बाबा साहब, स्टाम्प पर निशान लगाया था, वहां दस्तखत कर दिए न, आपने?०&lt;br /&gt;बूढ़ा ने अडूंस खोली। स्टाम्प की चिंदी-चिंदी कर वकील पर फेंक दी। रुपए की थैली सामने पटकी। उसने गेट पर लाठी ठकठकाई-०वकील छौ ना। केरसिंह पागल कोनी, कालजो बेच दे अपणो।० &lt;br /&gt;बूढ़ा लाठी उठाए कि वकील ने गेट बंद कर लिया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो कहानी तो हुई खत्म। अब आपको भी महसूस हुआ होगा कि मैंने इस कहानी के विषय में ऊपर जो भी कहा है, इस कहानी में छिपे गुणों की तुलना में शतांश भी नहीं है। हां, फोंट की अनुपलब्धता के कारण विराम चिह्न संबंधी अशुद्धियां रह गई हैं, इसके लिए क्षमा चाहता हूं। आपने धैयॅ के साथ यह कहानी पढ़ी, इसके लिए साधुवाद। इसमें कुछ भी अच्छा लगा हो,  आप इसके लिए रत्न कुमार सांभरिया जी को बधाई दे सकते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-4713265819698037824?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/4713265819698037824/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=4713265819698037824' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/4713265819698037824'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/4713265819698037824'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2008/01/blog-post_06.html' title='इसलिए-खेत-ने मार लिया मैदान'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-1335940724632935462</id><published>2008-01-04T04:57:00.000-08:00</published><updated>2008-01-04T05:02:00.864-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बधाई हो बधाई'/><title type='text'>ताराप्रकाश जोशी और रत्न कुमार सांभरिया को राजस्थान पत्रिका सृजनात्मक अवाडॅ</title><content type='html'>राजस्थान के प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका की ओर से प्रतिवषॅ साहित्य के क्षेत्र में सृजनात्मक लेखन के लिए दिए जाने पुरस्कारों के तहत वषॅ २००७ का सवॅश्रेष्ठ कविता का पुरस्कार जयपुर के वरिष्ठ अथ च प्रख्यात कवि व गीतकार ताराप्रकाश जोशी और सवॅश्रेष्ठ कहानी का पुरस्कार कथाकार रत्न कुमार सांभरिया को दिया जाएगा। जोशी के लगभग आधा दजॅन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उन्हें यह पुरस्कार १४ अक्टूबर २००७ को राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में प्रकाशित उनकी कविता-बेटी की किलकारी-के लिए प्रदान किया जाएगा। सांभरिया को यह पुरस्कार राजस्थान पत्रिका के २७ मई २००७ के रविवारीय परिशिष्ट में प्रकाशित उनकी कहानी-खेत-के लिए दिया जाएगा। दोनों साहित्यकारों को पुरस्कार के रूप में ग्यारह-ग्यारह हजार रुपए और प्रशस्ति पत्र प्रदान किए जाएंगे।  ये पुरस्कार उन्हें ६ जनवरी को होने वाले पं. झाबरमल्ल शरमा स्मृति व्याख्यानमाला के तहत आयोजित होने वाले समारोह में प्रदान किए जाएंगे। &lt;br /&gt;पिछले ग्यारह वषॅ से राजस्थान पत्रिका सृजनात्मक पुरस्कार कहानी व कविता वगॅ में निरंतर प्रदान किए जा रहे हैं। कविता वगॅ में पूवॅ में पुरस्कृत होने वालों में हैं - गोपालदास नीरज, मंगल सक्सेना, हरीश करमचंदाणी, भगवतीलाल व्यास, माधव नागदा, रामनाथ कमलाकर, गुरमीत बेदी, गोपाल गगॅ, अम्बिका दत्त, गोविंद माथुर और उमेश अपराधी। कहानी वगॅ में यादवेंद्र शरमा चंद्र, से. रा. यात्री, सावित्री परमार, यश गोयल, ज्ञान प्रकाश विवेक, साबिर हुसैन, मुरलीधर वैष्णव, सावित्री रांका, कुंदन सिंह परिहार, महीप सिंह और संगीता माथुर इससे पहले पुरस्कृत हो चुके हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो अब आप पढ़िए आदरणीय ताराप्रकाश जोशी की कविता या गुनगुनाइये यह गीत (क्योंकि यह सहज ही गेय भी है) जिसके लिए उन्हें पुरस्कृत किया जाएगा। इस कविता में कन्याभ्रूण हत्या से मानवता को होने वाले नुकसान और बेटियों की महत्ता पर कवि ने अंतमॅन की संवेदना को स्वर देने की सफल कोशिश की है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेटी की किलकारी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कन्या भ्रूण अगर मारोगे&lt;br /&gt;मां दुरगा का शाप लगेगा।&lt;br /&gt;बेटी की किलकारी के बिन&lt;br /&gt;आंगन-आंगन नहीं रहेगा।&lt;br /&gt;जिस घर बेटी जन्म न लेती&lt;br /&gt;वह घर सभ्य नहीं होता है।&lt;br /&gt;बेटी के आरतिए के बिन &lt;br /&gt;पावन यज्ञ नहीं होता है।&lt;br /&gt;यज्ञ बिना बादल रूठेंगे&lt;br /&gt;सूखेगी वरषा की रिमझिम।&lt;br /&gt;बेटी की पायल के स्वर बिन&lt;br /&gt;सावन-सावन नहीं रहेगा।&lt;br /&gt;आंगन-आंगन नहीं रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस घर बेटी जन्म न लेती&lt;br /&gt;उस घर कलियां झर जाती है।&lt;br /&gt;खुशबू निरवासित हो जाती&lt;br /&gt;गोपी गीत नहीं गाती है।&lt;br /&gt;गीत बिना बंशी चुप होगी&lt;br /&gt;कान्हा नाच नहीं पाएगा।&lt;br /&gt;बिन राधा के रास न होगा&lt;br /&gt;मधुबन-मधुबन नहीं रहेगा।&lt;br /&gt;आंगन-आंगन नहीं रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस घर बेटी जन्म न लेती, &lt;br /&gt;उस घर घड़े रीत जाते हैं।&lt;br /&gt;अन्नपूरणा अन्न न देती&lt;br /&gt;दुरभिक्षों के दिन आते हैं।&lt;br /&gt;बिन बेटी के भोर अलूणी&lt;br /&gt;थका-थका दिन सांझ बिहूणी।&lt;br /&gt;बेटी बिना न रोटी होगी&lt;br /&gt;प्राशन-प्राशन नहीं रहेगा&lt;br /&gt;आंगन-आंगन नहीं रहेगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस घर बेटी जन्म न लेती&lt;br /&gt;उसको लक्षमी कभी न वरती।&lt;br /&gt;भव सागर के भंवर जाल में&lt;br /&gt;उसकी नौका कभी न तरती।&lt;br /&gt;बेटी की आशीषों में ही&lt;br /&gt;बैकुंठों का वासा होता।&lt;br /&gt;बेटी के बिन किसी भाल का&lt;br /&gt;चंदन-चंदन नहीं रहेगा।&lt;br /&gt;आंगन-आंगन नहीं रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस घर बेटी जन्म न लेती&lt;br /&gt;वहां शारदा कभी न आती।&lt;br /&gt;बेटी की तुतली बोली बिन&lt;br /&gt;सारी कला विकल हो जाती। &lt;br /&gt;बेटी ही सुलझा सकती है, &lt;br /&gt;माता की उलझी पहेलियां।&lt;br /&gt;बेटी के बिन मां की आंखों&lt;br /&gt;अंजन-अंजन नहीं रहेगा।&lt;br /&gt;आंगन-आंगन नहीं रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस घर बेटी जन्म न लेगी&lt;br /&gt;राखी का त्यौहार न होगा।&lt;br /&gt;बिना रक्षाबंधन भैया का &lt;br /&gt;ममतामय संसार न होगा।&lt;br /&gt;भाषा का पहला स्वर बेटी&lt;br /&gt;शब्द-शब्द में आखर बेटी। &lt;br /&gt;बिन बेटी के जगत न होगा, &lt;br /&gt;सजॅन, सजॅन नहीं रहेगा।&lt;br /&gt;आंगन-आंगन नहीं रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस घर बेटी जन्म न लेती&lt;br /&gt;उसका निष्फल हर आयोजन।&lt;br /&gt;सब रिश्ते नीरस हो जाते &lt;br /&gt;अथॅहीन सारे संबोधन। &lt;br /&gt;मिलना-जुलना आना-जाना&lt;br /&gt;यह समाज का ताना-बाना।&lt;br /&gt;बिन बेटी रुखे अभिवादन&lt;br /&gt;वंदन-वंदन नहीं रहेगा। &lt;br /&gt;आंगन-आंगन नहीं रहेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कवि और गीतकार ताराप्रकाश जोशी की रचनाओं में सहज ही पाठक-श्रोता के हृदय में समा जाने की क्षमता है, जिससे आप अब तक परिचित हो चुके होंगे। इस ब्लॉग पर भविष्य में उनकी रचनाओं का रसास्वादन कराने का वादा है मेरा। &lt;br /&gt;कथाकार रत्नकुमार सांभरिया ने अपनी कहानी-खेत-में किन भावनाओं को छुआ है कि यह कथा पुरस्कार की हकदार बनी, इसकी उत्कंठा मुझे भी है, आपको भी होगी। अस्तु, शीघ्र ही उनकी यह पुरस्कृत कहानी और अन्य प्रतिनिधि कहानियां आपके सामने प्रस्तुत करूंगा। दोनों साहित्यकारों को मेरी अथ च आप सभी की ओर से कोटिशः बधाई और मंगलकामनाएं। तो आज बस इतना ही। &lt;br /&gt;(फोंट की अनुपलब्धता या फिर मेरी उनके बारे में अज्ञानता के कारण कविता में कुछ अशुद्धियां रह गई हैं, इसके लिए माफी चाहता हूं)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-1335940724632935462?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/1335940724632935462/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=1335940724632935462' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/1335940724632935462'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/1335940724632935462'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2008/01/blog-post_04.html' title='ताराप्रकाश जोशी और रत्न कुमार सांभरिया को राजस्थान पत्रिका सृजनात्मक अवाडॅ'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8734656157921319020.post-5688592835929238423</id><published>2008-01-04T04:04:00.000-08:00</published><updated>2008-01-05T11:50:25.712-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपील'/><title type='text'>साहित्य-संस्कृति-कला की त्रिवेणी में स्वागत है आपका</title><content type='html'>इस अपार संसार सागर में साहित्य की महिमा निराली है। इस सागर में कुछ ऐसे मोती हैं, जिनकी आभा से साहित्य जगत आलोकित होता है और हम-आप सरीखे साहित्यप्रेमी आनंदित। इन मोतियों को किसी प्रचार-प्रसार की तमन्ना नहीं होती है मगर फूल की खुशबू को हवा बिना किसी एप्रोच के वातावरण में बिखेर देती है। संस्कृति का प्रवाह तो हम सबमें सरस्वती की धारा की तरह अंदर ही अंदर प्रवाहित होती ही रहती है। इसके बिना तो श्वास-प्रश्वास ही नहीं चले, से इसका ऋण है हम सभी पर। इससे उऋण होना तो संभव ही नहीं है, लेकिन इससे जुड़ी घटनाओं का प्रचार-प्रसार कर उऋण होने का प्रयास तो किया ही जा सकता है। कला तो हर किसी की चाहत होती ही है। तो मेरे इस ब्लॉग पर साहित्य, संस्कृति, कला और इस सरीखी अन्य जानकारियां प्रस्तुत करने का लघु प्रयास है यह मेरा। यहां मेरे ही नहीं, आप सभी के प्रिय साहित्यकारों की प्रतिनिधि रचनाएं तथा विशेषकर गुलाबी नगरी जयपुर की साहित्य-संस्कृति-कला जगत से जुड़ी गतिविधयों की जानकारी देने की कोशिश होगी मेरी। आप सब भी इस यज्ञ में आहुति देने के लिए सादर आमंत्रित हैं। कोई भी सूचना आप manglammk@gmail.com पर प्रेषित कर मुझे कृताथॅ कर सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नववर्ष की मंगलकामनाओं के साथ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोहन कुमार मंगलम, जयपुर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8734656157921319020-5688592835929238423?l=sahitya-sanskritietc.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/feeds/5688592835929238423/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8734656157921319020&amp;postID=5688592835929238423' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/5688592835929238423'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8734656157921319020/posts/default/5688592835929238423'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sahitya-sanskritietc.blogspot.com/2008/01/blog-post.html' title='साहित्य-संस्कृति-कला की त्रिवेणी में स्वागत है आपका'/><author><name>manglam</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09256454129822743663</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_kibcpGtf_0M/RxuzluTZMbI/AAAAAAAAAGI/6YaVt4G7EGc/s320/1.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry></feed>
